देश के कई हिस्सों में किसानों ने खरीफ फसलों की बुआई शुरू कर दी है। विशेषकर उन इलाकों में जहां शुरुआती प्री-मानसून बारिश हो गई है। धान, सोयाबीन, मक्का, कपास, बाजरा और दालों की तैयारी जोर पकड़ रही है। वहीं कुछ राज्यों में मानसून अगले 4 से 5 दिनों में दस्तक दे सकता है। अधिकांश राज्यों के कृषि विभागों और कृषि विज्ञान केंद्रों ने किसानों को सलाह दी है कि वे 15 जून से पहले खरीफ फसलों की बुवाई ना करें। इस बार किसानों को मानसून के अच्छी उम्मीद है, क्योंकि मौसम विभाग ने सामान्य से बेहतर मानसून की संभावना जताई है। इस बार भी खरीफ सीजन को लेकर सरकार और कृषि विभाग ने तैयारियां शुरू कर दी है। किसानों को बीज, उर्वरक और नई तकनीक की जानकारी देने के लिए कई योजनाएं लागू की जा रही हैं। खरीफ फसलें वे फसलें होती है, जिनकी बुवाई मानसून के आगमन के साथ की जाती है। आमतौर पर जून और जुलाई में इनकी बुवाई शुरू होती है, जबकि सितंबर और अक्टूबर के बीच इनकी कटाई की जाती है। इन फसलों को अच्छी बारिश, गर्म मौसम और अधिक नमी की जरूरत होती है। यही वजह है कि यह खेती पूरी तरह मानसून पर निर्भर मानी जाती है। भारत में खरीफ सीजन दक्षिणी-पश्चिमी मानसून के साथ जून में शुरू होता है और अक्टूबर तक चलता है। कुछ फसलों जैसे कपास और गन्ने की कटाई नवंबर-दिसंबर तक भी जारी रहती है। देशभर में किसान खरीफ सीजन के दौरान कई तरह की फसलों की खेती करते हैं। इनमें धान सबसे प्रमुख फसल मानी जाती है। इसके अलावा मक्का, बाजरा, ज्वार, रागी, सोयाबीन, कपास, मूंगफली, तिलहन, सूरजमुखी, उड़द, मूंग और अरहर जैसी फसलें भी बड़े स्तर पर बोई जाती है। मोटे अनाज यानी श्री अन्न की खेती को भी अब लगातार बढ़ावा दिया जा रहा है। बाजरा, ज्वार, रागी, सांवा और कोदो जैसी फसलों की मांग बढ़ाने के साथ-साथ सरकार भी किसानों को उनकी खेती के लिए प्रोत्साहित कर रही है। खरीफ फसलों की अच्छी पैदावार के लिए 25 से 35 डिग्री सेल्सियस तापमान सही माना जाता है। इन फसलों को ज्यादा बारिश और नमी की जरूरत होती है। यही कारण है कि मानसून में देरी या कम बारिश का सीधा असर खरीफ उत्पादन पर पड़ता है। विशेषज्ञों के अनुसार अच्छी बुवाई के लिए किसानों को मानसून और मौसम के पूर्वानुमान पर नजर रखनी चाहिए।

