Thursday, July 16, 2026 |
Home Metro City Specialहिंसा नहीं, अहिंसा जीवन की अनिवार्यता है: जैनाचार्य विजयराज म.सा.

हिंसा नहीं, अहिंसा जीवन की अनिवार्यता है: जैनाचार्य विजयराज म.सा.

तिलक नगर के सूर्य मार्ग स्थित नवकार भवन में चातुर्मासिक प्रवचन

by Business Remedies
0 comments

बिजनेस रेमेडीज़/जयपुर। तिलक नगर के सूर्य मार्ग स्थित नवकार भवन में चातुर्मास के पांचवें दिन मंगलवार को प्रवचन में जैनाचार्य श्री विजयराज म.सा. ने मंगलाचरण के बाद भगवान महावीर के उत्तराध्ययन सूत्र के 31 वें अध्ययन ‘चरण विधि’ पर विवेचना करते हुए कहा कि जीवन में अहिंसा की अनिवार्यता बहुत जरूरी है। अहिंसा से ही व्यक्ति समृद्ध और उन्नत बनता है। पर आज व्यक्ति 24 घंटे हिंसा में उन्मुख रहता है। हिंसा का त्याग कर ही अच्छा श्रावक व श्राविकाएं बना जा सकता है। उन्होंने हिंसा के चार प्रकार आरम्भजा, संकल्पजा, उर्धागिनी और विरोधनी बताए। महाराज श्री ने कहा कि संकल्पजा हिंसा का मतलब है कि किसी भी जीव को नहीं मारने का संकल्प व्यक्ति को लेना चाहिए। अगर गृहस्थ जीवन में किसी व्यक्ति से गाड़ी में कहीं जाते वक्त भूलवश या गलती से किसी जीव की हत्या हो जाए तो उस पर वह पश्चाताप और प्रायश्चित करे। ऐसा कभी नहीं कहे कि ये तो चलता ही है, मर गया तो कोई बात नहीं। यह संकल्पता की उपेक्षा, अवज्ञा और अवहेलना है। वह गुणस्थान आरोहण के पुन: निचले स्तर पर पहुंच जाएगा।
आचार्य श्री ने प्रवचन में कहा कि धर्म का पहला पहलू कर्तव्य है। इसे मानव मात्र को निभाना चाहिए। जीव की रक्षा करना उसका कत् है। उन्होंने प्रणातिपात के बाद द्रव्य और भावपात के बारे में व्याख्या की। प्रणातिपात में विकास के नाम पर पेड़, पौधे काट दिए जाते हैं, इससे जीवों की हत्या होती है। विलासिता की भूख, विभाव की अधिनता और व्यसनों की गुलामी में व्यक्ति जीवों की हिंसा कर बैठता है। सही अर्थों में जैन वही है, जो इन सबसे दूरी बनाए रखता है। महाराज श्री ने कहा कि अगर परिवार अहिंसक है, तो कलेश मुक्त होगा। समाज आडम्बरों से, राष्ट्र भ्रष्टाचार से और विश्व आंतकवाद से मुक्त हो जाएगा। उन्होंने संयम की महत्वत्ता बताते हुए कहा कि अगर तन में संयम है, तो रोग मुक्त, वचन में संयम है तो कलह मुक्त और मन में संयम है तो तनाव मुक्त हो जाएंगे। इसलिए असंयम से निवृति और संयम की प्रवृति होनी चाहिए। हर व्यक्ति को संयम में रहकर ही अपने कार्य को अंजाम देने का प्रयास करते रहना चाहिए। आचार्य श्री ने कहा कि सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह और ब्रह्मचार्य का पालन करना साधु-संतों का आचरण होता है, अगर वे ऐसा नहीं करते हैं तो केवल वेशभूषा के संत या साधु कहलाएंगे। जबकि जैन श्रावक और श्राविकाओं में इसके प्रति आस्था होनी चाहिए। आचार्य श्री के प्रवचन से पहले श्री विनोद मुनि म.सा. ने जैन दर्शन पर विस्तृत विवेचना की और अंत में प्रवचन से संबंधित श्रावक-श्राविकाओं से प्रश्न पूछकर उत्तर जाने। प्रत्याख्यानों की श्रृंखला में बियासन, एकासना, आयम्बिल, नीवीं, उपवास, बेले, तेलें, चार, पांच, छह, सात,आठ उपवास आदि प्रत्याख्यानों के साथ मंगलवार को श्राविका नीतू ढाबरिया ने 26 उपवास के प्रत्याख्यान लिए। वहीं श्रावक-श्राविकाओं सहित चारित्र आत्माओं की बहुत गुप्त तपस्याएं जारी है। धर्मसभा के अंत में संचालन करते हुए संघ के महामंत्री नवीन लोढ़ा ने सभी बाहर से आए व सभा में उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं का स्वागत कर आभार व्यक्त किया व 19,20,21 जुलाई को होने वाले स्वाध्यायी शिविर की जानकारी धर्मसभा को दी। प्रवचन सभा बारिश की वजह से नवकार भवन में हुई। प्रवचन सभा में आज साध्वी जी नहीं आ पाए। संत श्री अनुपम मुनि,श्री दिव्यम मुनि,श्री मंथनप्रभ मुनि प्रवचन सभा में उपस्थित थे।



You may also like

Leave a Comment