वॉशिंगटन,
ईरान से जुड़े बढ़ते संघर्ष के कारण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर असर पड़ा है, जिसके चलते कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़कर 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं। होरमुज जलडमरूमध्य के जरिए होने वाली तेल आपूर्ति में बाधा आने से अंतरराष्ट्रीय बाजारों में चिंता बढ़ गई है और कई देशों की अर्थव्यवस्था पर दबाव बनने की आशंका जताई जा रही है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तेल की कीमतों में आई इस तेज वृद्धि का बचाव करते हुए कहा कि यह बढ़ोतरी अस्थायी है और ईरान के परमाणु खतरे का सामना करने की कीमत के रूप में देखी जानी चाहिए। उन्होंने अपने सोशल मीडिया मंच पर लिखा कि अल्पकालिक रूप से तेल की कीमतों में जो वृद्धि हुई है, वह वैश्विक सुरक्षा और शांति के लिए चुकाई जाने वाली छोटी कीमत है और ईरान के परमाणु खतरे के समाप्त होते ही कीमतें तेजी से नीचे आ जाएंगी।
संघर्ष के कारण कच्चे तेल की कीमतें लगभग 110 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गईं। पश्चिम टेक्सास इंटरमीडिएट कच्चा तेल करीब 20.75 प्रतिशत बढ़कर 109.75 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया, जबकि ब्रेंट कच्चा तेल 18 प्रतिशत से अधिक बढ़कर लगभग 109.48 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया। यह बढ़ोतरी पिछले कई दशकों में तेल वायदा कारोबार में दर्ज सबसे बड़ी साप्ताहिक उछालों में से एक मानी जा रही है। विशेषज्ञों के अनुसार इस तेजी के पीछे सबसे बड़ा कारण होरमुज जलडमरूमध्य में आपूर्ति बाधित होने का खतरा है। यह समुद्री मार्ग दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में से एक माना जाता है। वैश्विक स्तर पर बड़ी मात्रा में कच्चा तेल और तरलीकृत प्राकृतिक गैस की आपूर्ति इसी मार्ग से होकर गुजरती है। यदि यह मार्ग लंबे समय तक प्रभावित रहता है तो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर गंभीर असर पड़ सकता है।
संघर्ष के चलते कई जहाजों ने इस क्षेत्र से गुजरने से बचना शुरू कर दिया है, जिसके कारण तेल टैंकरों की आवाजाही में तेज गिरावट देखी गई है। हमलों और सुरक्षा खतरे के कारण समुद्री परिवहन प्रभावित हुआ है और ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला पर दबाव बढ़ गया है। खाड़ी क्षेत्र के प्रमुख उत्पादक देशों ने भी उत्पादन में कटौती शुरू कर दी है। निर्यात मार्ग प्रभावित होने के कारण भंडारण टंकियां तेजी से भर रही हैं। कई उत्पादकों को कुओं को अस्थायी रूप से बंद करने या उत्पादन धीमा करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।
तेल की कीमतों में तेजी का असर वैश्विक वित्तीय बाजारों पर भी तुरंत दिखाई दिया। एशियाई शेयर बाजारों में कारोबार शुरू होते ही भारी गिरावट दर्ज की गई। जापान का प्रमुख सूचकांक लगभग पांच प्रतिशत तक गिर गया, जबकि दक्षिण कोरिया के बाजार में सात प्रतिशत से अधिक की गिरावट देखी गई। इन दोनों अर्थव्यवस्थाओं की ऊर्जा जरूरतें बड़े पैमाने पर आयातित तेल और गैस पर निर्भर हैं, इसलिए कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर इन पर पड़ता है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह संघर्ष लंबे समय तक चलता है तो कच्चे तेल की कीमतें और ऊपर जा सकती हैं। बाजार से जुड़े कुछ आकलनों के अनुसार वर्ष के अंत तक कीमतें 143 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचने की संभावना भी जताई जा रही है।
ऊर्जा इतिहासकार डेनियल यरगिन का कहना है कि यदि स्थिति और बिगड़ती है तो यह दुनिया के इतिहास में दैनिक तेल उत्पादन के लिहाज से सबसे बड़ी आपूर्ति बाधा साबित हो सकती है। इससे वैश्विक ऊर्जा बाजार में गहरी अस्थिरता पैदा होने का खतरा है। संघर्ष का असर केवल ऊर्जा बाजार तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक व्यापार मार्ग भी प्रभावित हो रहे हैं। क्षेत्र में मिसाइल और ड्रोन हमलों के कारण एशिया, यूरोप और मध्य पूर्व के बीच व्यापारिक जहाजों की आवाजाही धीमी पड़ गई है, जिससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार गलियारों को नुकसान पहुंच रहा है। अर्थशास्त्रियों का कहना है कि इस स्थिति का सबसे अधिक आर्थिक दबाव एशिया और यूरोप पर पड़ सकता है क्योंकि ये क्षेत्र ऊर्जा के आयात पर काफी निर्भर हैं और उनकी बड़ी ऊर्जा आपूर्ति फारस की खाड़ी से होकर गुजरती है।
हालांकि अमेरिका को कुछ हद तक राहत मिल सकती है क्योंकि वहां घरेलू तेल उत्पादन काफी बड़ा है और ऊर्जा निर्यात भी बढ़ रहा है। फिर भी वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का असर अमेरिकी उपभोक्ताओं पर भी पड़ सकता है, क्योंकि ईंधन महंगा होने से परिवहन लागत बढ़ती है और इसका प्रभाव खाद्य वस्तुओं सहित अन्य कीमतों पर भी दिखाई देता है। इतिहास में भी फारस की खाड़ी में तेल आपूर्ति से जुड़े झटकों ने बड़े आर्थिक संकट पैदा किए हैं। वर्ष 1973 में अरब देशों के तेल प्रतिबंध और 1979 की ईरानी क्रांति के दौरान भी तेल की कीमतों में भारी उछाल आया था, जिसके कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था को गंभीर मंदी का सामना करना पड़ा था।

