नई दिल्ली,
मंगलवार को भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले मजबूत स्तर पर खुला। यह सुधार उस घोषणा के बाद देखने को मिला, जिसमें अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के ऊर्जा और बिजली ढांचे पर संभावित हमलों को पांच दिनों के लिए रोकने की बात कही। मंगलवार को रुपया लगभग 93.64 रुपये प्रति डॉलर के स्तर पर कारोबार करता दिखा, जबकि पिछले सत्र में यह 93.98 रुपये प्रति डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर तक गिर गया था। इस प्रकार, शुरुआती कारोबार में रुपये ने हल्की मजबूती दिखाई।
तनाव में कमी से मिला सहारा, लेकिन अनिश्चितता बरकरार
विश्लेषकों के अनुसार, बाजार ने पांच दिन की इस राहत को सकारात्मक रूप में लिया है, लेकिन अभी पूरी तरह भरोसा नहीं बना है। उनका मानना है कि यदि आगे भी तनाव में कमी के संकेत मिलते हैं, तो डॉलर के मुकाबले रुपया और मजबूत हो सकता है। सोमवार को रुपया तेज गिरावट के साथ 93.95 के नीचे पहुंच गया था और इसमें लगभग 0.37 प्रतिशत की कमजोरी दर्ज की गई थी। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का सीधा असर मुद्रा पर पड़ा है। विशेषज्ञों का कहना है कि कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने रुपये पर दबाव बढ़ाया है। भारत एक बड़ा आयातक देश होने के कारण तेल की महंगी कीमतों से आयात खर्च बढ़ता है, जिससे विदेशी मुद्रा का बहिर्वाह भी बढ़ता है। ऊंचे स्तर पर बने रहने वाले कच्चे तेल के दाम महंगाई को भी बढ़ा सकते हैं, जिससे आर्थिक वृद्धि के अनुमान प्रभावित हो सकते हैं और इसका नकारात्मक असर रुपये पर पड़ सकता है।
आर्थिक स्थिति कमजोर, आगे भी दबाव की आशंका
विश्लेषकों के मुताबिक, वैश्विक आर्थिक स्थिति अभी भी नाजुक बनी हुई है। जब तक भू-राजनीतिक तनाव और ऊर्जा कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी रहेंगी, तब तक रुपये पर दबाव बना रह सकता है। निकट अवधि में रुपया 93.25 से 94.25 के दायरे में कमजोर रुख के साथ कारोबार कर सकता है। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक वैश्विक स्तर पर कोई ठोस सकारात्मक संकेत नहीं मिलता, तब तक निवेशकों का रुझान सतर्क ही रहेगा।
बयानों में विरोधाभास से बढ़ी असमंजस की स्थिति
निवेशकों की धारणा उस समय बेहतर हुई जब डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि अमेरिका और ईरान के बीच पिछले दो दिनों में सकारात्मक बातचीत हुई है और फिलहाल किसी भी सैन्य कार्रवाई को टाल दिया गया है। हालांकि, ईरान की संसद के अध्यक्ष मोहम्मद-बाकर ग़ालिबाफ ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा कि अमेरिका के साथ कोई बातचीत नहीं हुई है। इस विरोधाभास ने बाजार में अनिश्चितता को और बढ़ा दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि हालिया सुधार भू-राजनीतिक तनाव में अस्थायी कमी के कारण है, लेकिन यह तेजी टिकेगी या नहीं, यह आगे आने वाले वैश्विक घटनाक्रम और कच्चे तेल की कीमतों पर निर्भर करेगा।

