जयपुर | चारु भाटिया
जोड़ों का दर्द और चलने–फिरने से जुड़ी समस्याएं अब केवल बढ़ती उम्र तक सीमित नहीं रह गई हैं। बदलती जीवनशैली, खेलों से जुड़ी चोटों, सड़क दुर्घटनाओं और उपचार के विकल्पों के प्रति बढ़ती जागरूकता के कारण ऑर्थोपेडिक्स के क्षेत्र में भी तेजी से बदलाव आया है। वहीं रोबोटिक्स, नेविगेशन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी तकनीकों ने जॉइंट रिप्लेसमेंट सर्जरी की योजना और प्रक्रिया को भी अधिक आधुनिक बना दिया है।
इसी विषय पर जयपुर स्थित ऋषभ मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल के जाने–माने ऑर्थोपेडिक एवं जॉइंट रिप्लेसमेंट सर्जन डॉ. रामनिवास स्वर्णकार से खास बातचीत हुई। उन्होंने अपने चिकित्सकीय सफर, ऑर्थोपेडिक्स में हो रहे तकनीकी बदलावों, इम्प्लांट के चयन, जॉइंट रिप्लेसमेंट से जुड़े आम डर और मरीजों के लिए व्यक्तिगत उपचार की जरूरत पर विस्तार से बात की।
सवाल: आप एक जाने–माने ऑर्थोपेडिक और जॉइंट रिप्लेसमेंट सर्जन हैं। हमें अपने सफर और इस क्षेत्र में आने की प्रेरणा के बारे में बताइए।
जवाब: चिकित्सा के क्षेत्र में मेरी यात्रा वर्ष 2002 में शुरू हुई, जब मैंने एमबीबीएस पाठ्यक्रम में प्रवेश लिया। मैंने वर्ष 2008 में अपनी एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी की। वर्ष 2011 से मैं सक्रिय रूप से क्लिनिकल मेडिसिन के क्षेत्र में कार्य कर रहा हूँ और इसी दौरान मैंने हड्डियों एवं जोड़ों से संबंधित रोगों के उपचार में अपनी विशेषज्ञता को लगातार विकसित किया। मैंने एसएमएस मेडिकल कॉलेज से स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त की और इसके बाद ऑर्थोपेडिक्स में एमएस की डिग्री पूरी की।
इसके बाद मैंने जॉइंट रिप्लेसमेंट के क्षेत्र में विशेषज्ञता हासिल की। इसके लिए मैंने बेंगलुरु स्थित साकरा वर्ल्ड हॉस्पिटल से आर्थ्रोप्लास्टी में एफएनबी की पढ़ाई पूरी की। साथ ही, मैंने दक्षिण कोरिया के सियोल स्थित बुमिन हॉस्पिटल से रोबोटिक जॉइंट रिप्लेसमेंट और हिप आर्थ्रोस्कोपी में अंतरराष्ट्रीय फेलोशिप भी प्राप्त की। इससे पहले मैं झुंझुनूं और भीलवाड़ा जैसे शहरों में भी कार्य कर चुका हूँ। हाल ही में मैंने ऋषभ मल्टी–स्पेशियलिटी हॉस्पिटल में कार्यभार संभाला है।
जहाँ तक इस क्षेत्र में आने की प्रेरणा का सवाल है, तो आजकल जोड़ों से जुड़ी समस्याएँ तेजी से बढ़ रही हैं, विशेष रूप से बुजुर्गों में। बहुत से लोग जोड़ों के दर्द और चलने–फिरने में कठिनाई का सामना करते हैं, जिसका उनके जीवन की गुणवत्ता पर गहरा प्रभाव पड़ता है। ऐसे में किसी मरीज को दर्द से राहत दिलाना, उसकी चलने–फिरने की क्षमता वापस लाना और उसे फिर से सक्रिय जीवन जीने में मदद करना मेरे लिए बेहद संतोषजनक अनुभव होता है। किसी मरीज के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने का यही अवसर इस क्षेत्र में काम करने की मेरी सबसे बड़ी प्रेरणाओं में से एक रहा है।
सवाल: ऑर्थोपेडिक्स के क्षेत्र में तकनीकी विकास को आप किस तरह देखते हैं?
जवाब: पिछले कुछ वर्षों में ऑर्थोपेडिक्स के क्षेत्र में तकनीक के स्तर पर बहुत तेजी से विकास हुआ है। इम्प्लांट के डिजाइन, उसकी कार्यक्षमता और उसकी टिकाऊ क्षमता में महत्वपूर्ण सुधार हुए हैं। इसके साथ ही सर्जरी की तकनीकों और प्रक्रियाओं में भी काफी बदलाव आया है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, कंप्यूटर नेविगेशन और रोबोटिक तकनीक जैसी सुविधाएं आधुनिक ऑर्थोपेडिक प्रैक्टिस का हिस्सा बनती जा रही हैं। इन तकनीकों की मदद से सर्जन को डायग्नोसिस, सर्जरी की योजना बनाने और सर्जरी के दौरान अधिक सटीकता हासिल करने में मदद मिल सकती है।
मेरे अनुसार तकनीक सर्जन की जगह लेने वाली चीज नहीं, बल्कि उसकी मदद करने वाला एक महत्वपूर्ण साधन है। इससे सर्जिकल प्रक्रिया की सटीकता बढ़ सकती है और बेहतर परिणाम हासिल करने में मदद मिल सकती है। सर्जिकल तकनीकों और संक्रमण नियंत्रण के क्षेत्र में हुए विकास ने जॉइंट रिप्लेसमेंट को भी पहले की तुलना में अधिक परिणाम–आधारित और व्यवस्थित बनाया है।
सवाल: किसी मरीज के लिए इम्प्लांट का सुझाव देते समय किन बातों का ध्यान रखा जाता है?
जवाब: बाजार में कई प्रकार के इम्प्लांट उपलब्ध हैं और उनका चुनाव कई अलग–अलग कारकों पर निर्भर करता है। इनमें एक महत्वपूर्ण पहलू मरीज की आर्थिक क्षमता है। मरीज को इम्प्लांट की कीमत और उसके सामने मौजूद विकल्पों के बारे में स्पष्ट जानकारी मिलनी चाहिए।
हम मरीज को यह भी बताते हैं कि इम्प्लांट कितने समय तक चल सकता है और उसकी बीमारी की स्थिति क्या है। इम्प्लांट की कीमत उसके डिजाइन और उसमें इस्तेमाल होने वाली धातु या सामग्री के आधार पर भी अलग–अलग हो सकती है।
मेरा मानना है कि किसी भी निर्णय से पहले मरीज को उपलब्ध विकल्पों, उनके फायदे, संभावित टिकाऊपन और लागत के बारे में पूरी जानकारी दी जानी चाहिए।
सवाल: जॉइंट रिप्लेसमेंट को लेकर सबसे आम मिथक या डर क्या है?
जवाब: जॉइंट रिप्लेसमेंट सर्जरी को लेकर मरीजों में एक स्वाभाविक डर देखने को मिलता है। कई मरीजों को लगता है कि सर्जरी कराने से उनकी परेशानी और बढ़ सकती है या रिकवरी बहुत मुश्किल होगी।
इस डर को दूर करने में मरीज की सही जानकारी और काउंसलिंग की महत्वपूर्ण भूमिका है। सबसे पहले हम मरीज को उसकी बीमारी, उसकी गंभीरता और उपलब्ध उपचार विकल्पों के बारे में समझाते हैं। समस्या कितनी गंभीर है, उसी के आधार पर यह तय किया जाता है कि किस प्रकार का उपचार उपयुक्त होगा।
मैं यह भी मानता हूं कि उपचार का फैसला केवल डॉक्टर का नहीं होना चाहिए। मरीज स्वयं भी इस प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है। उसकी सुविधा, पसंद, अपेक्षाएं और जीवनशैली की जरूरतों को भी ध्यान में रखना जरूरी है। जब मरीज अपनी बीमारी और उपचार के बारे में अच्छी तरह समझता है, तो उसका आत्मविश्वास बढ़ता है और वह सोच–समझकर निर्णय लेने में सक्षम होता है।
सवाल: आजकल कम उम्र के लोगों में भी घुटने और जोड़ों की समस्याएं देखने को मिल रही हैं। इसके पीछे क्या कारण हो सकते हैं?
जवाब: उम्रदराज लोगों में जोड़ों की समस्याएं अक्सर उम्र से जुड़े बदलाव और जोड़ के घिसने के कारण होती हैं। लेकिन युवा लोगों में इसके अलग–अलग कारण हो सकते हैं।
खेलों के दौरान होने वाली चोटें और सड़क दुर्घटनाएं इसके प्रमुख कारणों में शामिल हैं। ऐसी चोटों से कार्टिलेज, लिगामेंट और जोड़ के आसपास के अन्य सॉफ्ट टिश्यू प्रभावित हो सकते हैं। इसके अलावा हड्डियों और जोड़ों से जुड़ी कुछ बीमारियां भी कम उम्र में बढ़ सकती हैं।
इसलिए यह मानना सही नहीं है कि जोड़ों की समस्या केवल बुजुर्गों की बीमारी है। चोट, जीवनशैली और कुछ विशेष चिकित्सकीय स्थितियां अलग–अलग उम्र के लोगों को प्रभावित कर सकती हैं।
सवाल: महिलाओं में हड्डियों से जुड़ी समस्याएं बढ़ने के पीछे क्या कारण हैं?
जवाब: महिलाओं में मेनोपॉज के बाद होने वाले हार्मोनल बदलाव एक महत्वपूर्ण कारण हो सकते हैं। मेनोपॉज के बाद ऑस्टियोपोरोसिस और हड्डियों से जुड़ी समस्याओं का जोखिम बढ़ सकता है।
हड्डियों का घनत्व कम होने से वे कमजोर हो सकती हैं और दर्द तथा फ्रैक्चर का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए महिलाओं को बढ़ती उम्र के साथ अपनी हड्डियों के स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान देना चाहिए। समय पर जांच, उचित पोषण, शारीरिक गतिविधि और डॉक्टर की सलाह हड्डियों को स्वस्थ रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
सवाल: 50 से 60 वर्ष की उम्र के मरीज में जॉइंट रिप्लेसमेंट सर्जरी से पहले किन सावधानियों की जरूरत होती है?
जवाब: सर्जरी से पहले मरीज की विस्तृत मेडिकल जांच बेहद जरूरी है। खासकर इस उम्र में डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और थायरॉयड जैसी स्थितियों की जांच की जाती है और यह सुनिश्चित किया जाता है कि वे नियंत्रित स्थिति में हों।
मरीज की पूरी मेडिकल हिस्ट्री को भी ध्यान में रखना जरूरी है। उदाहरण के लिए, यदि मरीज खून पतला करने वाली दवाएं ले रहा है, तो सर्जरी से पहले इस बात का विशेष ध्यान रखना पड़ता है। मरीज की स्थिति के अनुसार संबंधित विशेषज्ञ की सलाह भी ली जा सकती है।
सर्जरी से पहले संभावित जोखिम और जटिलताओं के बारे में मरीज को जानकारी देना भी जरूरी है। उचित प्री–ऑपरेटिव जांच और मौजूदा बीमारियों को नियंत्रित करने से सर्जरी को अधिक सुरक्षित बनाने में मदद मिल सकती है।
सवाल: आने वाले वर्षों में ऑर्थोपेडिक्स का क्षेत्र किस दिशा में आगे बढ़ता दिखाई देता है?
जवाब: आने वाले समय में ऑर्थोपेडिक्स में तकनीक की भूमिका और बढ़ेगी। नए उपकरण, बेहतर प्रक्रियाएं और आधुनिक तकनीकों का अधिक इस्तेमाल सर्जरी को और सटीक तथा प्रभावी बनाने में मदद कर सकता है।
लेकिन यह समझना भी जरूरी है कि तकनीक सर्जन की जगह नहीं लेगी। यह डॉक्टर के लिए एक मददगार साधन बनी रहेगी। मरीज की स्थिति को समझना, सही क्लिनिकल निर्णय लेना और डॉक्टर का अनुभव हमेशा अच्छे उपचार का महत्वपूर्ण हिस्सा रहेगा।
सवाल: अंत में, उन पाठकों के लिए आपका क्या संदेश है जो किसी ऑर्थोपेडिक समस्या से जूझ रहे हैं?
जवाब: मेरा संदेश बिल्कुल स्पष्ट है—लगातार होने वाले जोड़ों के दर्द को नजरअंदाज न करें। यदि आपको दर्द, सूजन, अकड़न या चलने–फिरने में परेशानी हो रही है, तो समय पर ऑर्थोपेडिक विशेषज्ञ से सलाह लें।
समय रहते जांच कराने से समस्या के मूल कारण को समझने और सही उपचार चुनने में मदद मिल सकती है। कई मामलों में समय पर शुरू किया गया कंजर्वेटिव उपचार समस्या को नियंत्रित करने और उसके बढ़ने से रोकने में मदद कर सकता है।
मरीजों को अपने डॉक्टर द्वारा बताए गए उपचार का पालन करना चाहिए और बिना सलाह के खुद से इलाज करने या डॉक्टर से मिलने में अनावश्यक देरी करने से बचना चाहिए। किसी समस्या की जितनी जल्दी सही तरीके से जांच और पहचान होगी, उतनी ही बेहतर तरीके से उचित उपचार चुना जा सकेगा और मरीज की गतिशीलता तथा जीवन की गुणवत्ता को बनाए रखने में मदद मिलेगी।

