हाल ही सर्वोच्च न्यायालय ने भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण ( एफएसएसएआई) से उन पैकेटबंद खाद्य पदार्थों पर फ्रंट ऑफ पैक यानी पैकेट पर सामने की ओर चेतावनी लेबल लगाने पर गंभीरता से विचार करने को कहा, जो चीनी, संतृप्त वसा, ट्रांस वसा और सोडियम की अधिक मात्रा वाले हों। न्यायालय ने यह भी कहा कि ऐसे लेबल सार्वजनिक स्वास्थ्य संबंधी लक्ष्यों को हासिल करने में मददगार हो सकते हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने इस पर चार सप्ताह में जवाब मांगा है। यह बात नियामक के लिए खास है क्योंकि उसने वर्षों तक इस मुद्दे पर बहस तो की लेकिन मानदंडों को अंतिम रूप नहीं प्रदान किया। देश में मोटापे की समस्या चिंताजनक रूप से बढ़ रही है और अब वह एक प्रमुख सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बन चुकी है।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण की 2019-21 की रिपोर्ट बताती है कि 24 फीसदी महिलाएं और 23 फीसदी पुरुष अधिक वजन या मोटापे की समस्या से जूझ रहे हैं। पांच साल से कम उम्र के बच्चों में अतिरिक्त वजन साल 2015-16 के 2.1 फीसदी से बढक़र 2019-21 में 3.4 फीसदी हो गया। वल्र्ड ओबेसिटी एटलस 2024 का अनुमान है कि साल 2020 में 3.3 करोड़ से अधिक भारतीय बच्चे मोटापे से ग्रस्त थे और यह संख्या 2035 तक बढक़र 8.3 करोड़ तक हो सकती है। यह 15 साल में दोगुने से अधिक इजाफा है। इसके साथ-साथ ही भारत अति प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों के लिए सबसे तेजी से बढ़ते बाजारों में से एक बन चुका है।
वर्ष 2025-26 की आर्थिक समीक्षा में इस बात को रेखांकित किया गया है कि 2009 से 2023 के बीच ऐसे अत्यधिक प्रसंस्करण वाले खाद्य पदार्थों की बिक्री में 150 फीसदी से अधिक इजाफा हुआ। यह मोटापे, डायबिटीज और अन्य कई बीमारियों की प्रमुख वजह है। लगभग इसी अवधि में मोटापा कम से कम दोगुना हो गया है और इनके आपसी संबंधों की अनदेखी करना मुश्किल है। वैश्विक साक्ष्यों का एक समूह, जिसमें लैंसेट की ऐसे खाद्य पदार्थों पर एक श्रृंखला भी शामिल है, ऐसे खाद्य पदार्थों की अधिक खपत को मोटापा, डायबिटीज, दिल की बीमारियों, श्वसन संबंधी बीमारियों और यहां तक कि मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से भी जोड़ता है।

