बच्चों व किशोरों की सोशल मीडिया पर बढ़ती अति-सक्रियता अभिभावकों ही नहीं, देश के लिये भी एक गंभीर चिंता का विषय है। छात्रों का पढ़ाई से भटकाव व एकाग्रता में गिरावट समय की बड़ी फिक्र है। इसी बीच इकोनॉमिक सर्वे में सोशल मीडिया तक उम्र के हिसाब से पहुंच का सुझाव एक स्वागत योग्यकदम है। सालों से, डिजिटल विस्तार को एक बिना शर्त अच्छे बदलाव के रूप में देखा जाता रहा है। कहा जाता रहा है कि सोशल मीडिया तक पहुंच को लोकतांत्रिक बनाने, डिजिटल लिटरेसी की खामियों को दूर करने और शिक्षा को आधुनिक बनाने में डिजिटल क्रांति सहायक है। निश्चित रूप से आर्थिक सर्वे में इस बाबत उल्लेख एक असहज करने वाली सच्चाई को संतुलित करने का प्रयास करता है। यह स्वीकार किया जा रहा है कि बिना रोक-टोक के डिजिटल एक्सपोजर तेजी से एक सार्वजनिक स्वास्थ्य चिंता बनता जा रहा है। सही मायनों में डिजिटल लत को मानसिक स्वास्थ्य, शैक्षणिक प्रदर्शन और उत्पादकता को प्रभावित करने वाली समस्या के रूप मे पहचानते हुए, सर्वे इस बहस को तथ्यों पर आधारित नीति बनाने की जरूरत बताता है। इसकी सिफारिश है कि उम्र के हिसाब से एक्सेस की सीमाएं तय करने, उम्र की वेरिफिकेशन के लिये प्लेटफॉर्मों की जवाबदेही निर्धारित करने, बच्चों के लिये सरल डिवाइस बनाने और ऑनलाइन कक्षाओं पर निर्भरता कम करने की आवश्यकता है। सही मायनों में इस मुद्दे पर वैश्विक सहमति का ही अनुसरण किया जा रहा है। वास्तव में बच्चों को सम्मोहित करने वाले डिजिटल डिजाइनों से उन्हें सुरक्षा उपलब्ध कराने की भी जरूरत है। जो कोमल मन-मस्तिष्क वाले बच्चों पर खासा नकारात्मक प्रभाव डालते हैं। निश्चित रूप से डिजिटल लत के शिकार होते बच्चों व किशोरों के, शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य के मद्देनजर राष्ट्रीय स्तर पर नीति-निर्धारण समय की मांग है। इसके अलावा इस बाबत सामूहिक जिम्मेदारी पर जोर देना भी उतना ही जरूरी है। तभी इस संकट का आशाजनक समाधान तलाशना संभव हो सकेगा।

