भारत की कच्चे तेल की मांग वर्ष, २०२५-२६ में प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेज गति से बढ़ोतरी होने की उम्मीद है। पिछले दिनों तेल उत्पादक देशों के संगठन ओपेक ने वैश्विक परिदृश्य में कहा है कि यह चीन की मांग की तुलना में दोगुनी होगी। पिछले दशक में वैश्विक तेल मांग में वृद्धि को गति देने का काम भले ही चीन ने किया था, लेकिन अगले दशक में भारत यह भूमिका निभाएगा। जहां चीन दुनिया में दूसरे नंबर का तेल उपभोक्ता है, जबकि भारत तीसरे स्थान पर है लेकिन दोनों देशों की मांग वृद्धि में अंतर है। भारत में मांग की वृद्धि और आयात पर निर्भरता अधिक होगी। अगले दशक में भारत में मांग चीन की तुलना में अधिक तेजी से बढ़ेगी, क्योंकि चीन की आर्थिक वृद्धि सुस्त हो रही है और नए ऊर्जा वाहनों का प्रवेश तेज हो रहा है। चीन में कच्चे तेल की खपत अगले तीन से पांच वर्षों में चरम पर होगी, जबकि भारत में इसी अवधि में तीन-पांच प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि की उम्मीद है। दोनों देश तेल और गैस आयात पर बहुत अधिक निर्भर हैं लेकिन मांग में सुस्त वृद्धि और घरेलू उत्पादन बढऩे से चीन की तेल आयात पर निर्भरता कम होने का अनुमान है। यदि भारत कच्चे तेल के घरेलू उत्पादन में गिरावट को नहीं रोक पाता है तो आयात पर उसकी निर्भरता बढ़ जाएगी। चीन की व्यापक तेल एवं गैस खपत इसकी राष्ट्रीय तेल कंपनियों के पैमाने को रेखांकित करती है, जो संभवत: अगले तीन-पांच वर्षों में उत्पादन वृद्धि में अपने भारतीय समकक्षों से आगे निकल जाएंगी। भारतीय तेल कंपनियों को पुराने तेल कुओं और धीमे निवेश से चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। जहां एक ओर भारतीय एनओसी घरेलू तेल और गैस उत्पादन को बढ़ावा देने की योजना बना रही हैं, लेकिन इस पर अमल होना अभी बाकी है। इसके अलावा हरित प्रौद्योगिकियों में निवेश का दबाव भी भारतीय कंपनियों पर अधिक होता है। भारत में मांग की वृद्धि और आयात पर निर्भरता अधिक है। अगले दशक में भारत में मांग चीन की तुलना में अधिक तेजी से बढ़ेगी, क्योंकि चीन की आर्थिक वृद्धि सुस्त हो रही है और नए इलेक्ट्रिक वाहनों का प्रवेश तेज हो रहा है।

