नई दिल्ली,
वित्तीय सेवा विभाग (डीएफएस) के सचिव एम नागराजू ने कहा कि देश के वित्तीय संस्थानों को अधिक चुस्त और प्रभावी बनाने के लिए क्रेडिट-जीडीपी अनुपात बढ़ाना आवश्यक है। उन्होंने विकसित भारत के लक्ष्य के अनुरूप बड़े स्तर पर वित्तपोषण के नए तरीके अपनाने पर भी जोर दिया।
कर्नाटक के कूर्ग में आयोजित डीएफएस के ‘चिंतन शिविर’ को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि इस बैठक में सामने आए विचार विभाग और उससे जुड़े वित्तीय संस्थानों के लिए साझा दृष्टि और कार्ययोजना तैयार करने का मार्ग प्रशस्त करेंगे। कार्यक्रम में सार्वजनिक नीति विशेषज्ञों तथा वित्तपोषण से जुड़े विभिन्न क्षेत्रों के अनुभवी लोगों ने अपने सुझाव प्रस्तुत किए। नीति आयोग के पूर्व मुख्य कार्यकारी अधिकारी अमिताभ कांत ने लघु, सूक्ष्म और मध्यम उद्यमों के वित्तपोषण में बैंकों की अहम भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने जन आधार की तर्ज पर जन व्यापार व्यवस्था विकसित करने और कारोबार लागत कम करने के लिए नियम आधारित साधनों को मजबूत करने की आवश्यकता बताई।
कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय के पूर्व सचिव डॉ. के. पी. कृष्णन ने देश में और अधिक गिफ्ट सिटी जैसे वित्तीय केंद्र विकसित करने, मजबूत बॉन्ड बाजार तैयार करने तथा मध्यस्थता लागत घटाने पर जोर दिया। उनका कहना था कि इससे निवेश प्रवाह बढ़ेगा और वित्तीय प्रणाली अधिक प्रतिस्पर्धी बनेगी। चिंतन शिविर का मुख्य उद्देश्य वर्ष 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करने में वित्तीय संस्थानों की भूमिका पर नए दृष्टिकोण और रचनात्मक सुझाव जुटाना था। कार्यक्रम में सभी हितधारकों ने सक्रिय भागीदारी की और बैंकिंग तथा अन्य वित्तीय सेवाओं को भविष्य की रणनीति के अनुरूप ढालने पर व्यापक चर्चा हुई।
वित्त मंत्रालय के अनुसार, विशेषज्ञों और प्रतिभागियों ने बैंकिंग एवं साइबर सुरक्षा, वित्तीय समावेशन तथा 2047 तक पूर्ण बीमित और पेंशन युक्त समाज बनाने जैसे विषयों पर विस्तार से विचार-विमर्श किया। दो दिन की बैठक से कई सुझाव सामने आए जिनमें स्वायत्त संगठन मॉडल, डिजिटल भरोसा, निवेश बढ़ाने के नवाचार तरीके, नए बीमा व पेंशन उत्पाद, वित्तीय साक्षरता बढ़ाना तथा तेजी से बदलती वैश्विक व्यवस्था में अधिक मजबूत वित्तीय तंत्र विकसित करना शामिल है।

