बिजनेस रेमेडीज/जयपुर। भारत का खनन क्षेत्र पारंपरिक कार्यप्रणालियों से आगे बढ़ते हुए डिजिटल तकनीक, रणनीतिक अन्वेषण, पर्यावरणीय उत्तरदायित्व और सुदृढ़ नीतिगत समन्वय की दिशा में तेजी से अग्रसर है। यह विचार अंतरराष्ट्रीय माइनिंग सेमिनार के दूसरे दिन देश-दुनिया के विशेषज्ञों ने रखे।
गौरतलब है कि संगोष्ठी के दूसरे दिन 4 तकनीकी सत्रों का आयोजन किया गया। सत्रों की अध्यक्षता खनन क्षेत्र के विशेषज्ञों प्रो. सुशील भंडारी, डॉ. एम. के. पंडित, धनंजय रेड्डी व डॉ. सुनील वशिष्ठ ने की। कार्यक्रम के दौरान डॉ. मनोज कुमार गौड़ ने सभी सत्रों का विवरण प्रस्तुत करते हुए मुख्य बिंदुओं और निष्कर्षों का सार बताया। सम्मेलन में देश के विभिन्न हिस्सों के साथ ऑस्ट्रेलिया, नॉर्थ अमेरिका, कनाडा, अफ्रीका सहित कई देशों से खनन विशेषज्ञ, वैज्ञानिक, नीति-निर्माता, उद्योग प्रतिनिधि और शिक्षाविद हिस्सा ले रहे हैं।
आधुनिक तकनीकों के समावेशन से खनन कार्य अधिक सुरक्षित: विशेषज्ञों ने इस बात पर बल दिया कि आधुनिक तकनीकों के समावेशन से खनन कार्य अधिक सुरक्षित, पारदर्शी और उत्पादक बन रहे हैं। अध्यक्ष जयपुर चैप्टर ललित मोहन सोनी ने बताया कि विचार-विमर्श के दौरान रेखांकित किया गया कि विकास अब केवल औपचारिक अनुपालन का विषय नहीं रह गया है, बल्कि इसे खनन संचालन का मूल सिद्धांत बनाया जाना आवश्यक है। पर्यावरण संरक्षण, कार्बन उत्सर्जन में कमी, सुरक्षित खनन पद्धतियां तथा संसाधनों का जिम्मेदार उपयोग सभी पहलू ‘नेट-जीरो’ लक्ष्य और दीर्घकालिक विकास की आधारशिला हैं।
ऊर्जा आत्मनिर्भरता और रोजगार सृजन का महत्वपूर्ण स्तंभ: ‘विजन-2047’ के संदर्भ में वक्ताओं ने खनन क्षेत्र को राष्ट्र की आर्थिक प्रगति, ऊर्जा आत्मनिर्भरता और रोजगार सृजन का महत्वपूर्ण स्तंभ बताया। उन्होंने कहा कि सरकार, उद्योग, शिक्षाविदों और तकनीकी विशेषज्ञों के समन्वित प्रयासों से भारत का खनन क्षेत्र वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी, सुरक्षित और पर्यावरण-सम्मत स्वरूप की ओर अग्रसर है। ऐसे में संगोष्ठी के तकनीकी सत्रों ने संदेश दिया कि तकनीकी नवाचार, सतत विकास और दूरदर्शी नीति-निर्माण के सामंजस्य से ही भारत का खनन क्षेत्र वर्ष 2047 तक सशक्त, आत्मनिर्भर और विश्वस्तरीय पहचान स्थापित कर सकेगा।

