Friday, July 10, 2026 |
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अब मौसमी फलों से बनेगा इथेनॉल!

किसानों की आय बढ़ाने की नई क्रांतिकारी पहल

by Business Remedies
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CSIR-NIIST और 3CousinLabs मिलकर फलों के गूदे से बनाएंगे बायोइथेनॉल, किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में बड़ा कदम

नई दिल्ली/हैदराबाद | बिजनेस रेमेडीज | भारत में बायोफ्यूल को बढ़ावा देने और फसल अपशेष व बर्बादी को कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है। Council of Scientific and Industrial Research (CSIR) के National Institute for Interdisciplinary Science and Technology (NIIST) ने हैदराबाद स्थित बायोटेक स्टार्टअप 3CousinLabs के साथ एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं। इस परियोजना के तहत आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में उपलब्ध मौसमी फलों के गूदे (पल्प) और जूस से इथेनॉल (बायोइथेनॉल) उत्पादन की तकनीक का पायलट स्तर पर अध्ययन और व्यावसायिक संभावनाओं का मूल्यांकन किया जाएगा।

परियोजना का नाम और उद्देश्य

परियोजना का शीर्षक ‘Fruit Pulp and Juices से Ethanol उत्पादन के लिए Pilot-Scale and Feasibility Studies’ (Pilot-Scale and Feasibility Studies for the Production of Ethanol from Fruit Pulp and Juices) रखा गया है। इसका मुख्य लक्ष्य विभिन्न मौसमी फलों से बायोइथेनॉल बनाने की प्रक्रिया को वैज्ञानिक रूप से सत्यापित करना, प्रक्रिया को अनुकूलित करना और बड़े पैमाने पर व्यावसायिक उत्पादन के लिए तकनीकी व आर्थिक आंकड़े जुटाना है। CSIR-NIIST के निदेशक Dr. C. Anantharamakrishnan और 3CousinLabs के मैनेजिंग डायरेक्टर P. Srinivas की उपस्थिति में यह एमओयू साइन किया गया।

स्टार्टअप की नवोन्मेषी तकनीक

3CousinLabs ने फलों के गूदे और जूस को इथेनॉल में बदलने की एक नवीन तकनीक विकसित की है। CSIR-NIIST अपनी प्रयोगशाला में 150 से 200 लीटर क्षमता वाले बैचों में पायलट स्तर के परीक्षण करेगा। इन परीक्षणों से तकनीक की विश्वसनीयता, उत्पादन दक्षता, ऊर्जा खपत और आर्थिक व्यवहार्यता का आकलन किया जाएगा, जिसके आधार पर बड़े पैमाने पर व्यावसायिक उत्पादन की राह प्रशस्त होगी।

किसानों और पर्यावरण को फायदा

यह पहल कई मोर्चों पर फायदेमंद साबित होने वाली है:

  1. फलों की बर्बादी में कमी : भारत में मौसमी फलों की भारी मात्रा बिना बिके या खराब होकर बर्बाद हो जाती है। इस तकनीक से ऐसे फलों का बेहतर उपयोग होगा।
  2. किसानों की अतिरिक्त आय : फल उत्पादक, किसान उत्पादक संगठन और विशेष रूप से आंध्र प्रदेश-तेलंगाना के किसान नए आय स्रोत से लाभान्वित होंगे।
  3. बायोफ्यूल को बढ़ावा : सरकार की ईंधन मिश्रण नीति (इथेनॉल ब्लेंडिंग) को मजबूती मिलेगी। फल-आधारित इथेनॉल गन्ना या अन्य पारंपरिक स्रोतों का विकल्प बन सकता है।
  4. सस्टेनेबल डेवलपमेंट : अपशेष से ईंधन बनने से पर्यावरण प्रदूषण कम होगा और सर्कुलर इकोनॉमी को बढ़ावा मिलेगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह पहल न केवल फसल हानि कम करेगी बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाएगी।

अभी मिला रहे 20 प्रतिशत इथेनॉल ब्लेंडिंग

भारत सरकार बायोफ्यूल मिशन के तहत 2025 तक 20 प्रतिशत इथेनॉल ब्लेंडिंग का लक्ष्य रखा है। पारंपरिक रूप से गन्ने, मक्का आदि से इथेनॉल बनता रहा है, लेकिन फल-आधारित प्रक्रिया विविधीकरण और स्थानीय संसाधनों के उपयोग का नया उदाहरण है। CSIR-NIIST जैसे संस्थान इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

आगे की राह

पायलट परीक्षणों के सफल होने के बाद यह तकनीक व्यावसायिक स्तर पर अपनाई जा सकेगी। इससे न केवल किसानों की आय बढ़ेगी बल्कि रोजगार सृजन और स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन को भी गति मिलेगी। 3CousinLabs के प्रयास और CSIR-NIIST की विशेषज्ञता से यह परियोजना जल्द ही फल उत्पादक क्षेत्रों में नई क्रांति ला सकती है। किसान भाइयों के लिए यह सचमुच एक ‘स्वर्णिम अवसर’ साबित हो सकता है।

वर्जन

  • सबसे पहले सरकार ने पांच प्रतिशत की ब्लेंडिंग चालू की थी। आज यह बढ़कर 20 प्रतिशत तक हो गया है। टेस्ट में यह पास हुआ है कि इससे प्रदूषण कम होता है। इससे नए मॉडल की कारें भी चल सकती हैं। वर्तमान में मक्के के इथेनॉल को पेट्रोल में मिलाया जा रहा है। साथ ही अन्य फलों से बने इथेनॉल को भी मिलाने की तैयारी है। इथेनॉल मिलाने में नुकसान कुछ भी नहीं, लेकिन अगर टंकी में पानी चला जाए तो पेट्रोल और इथेनॉल अलग-अलग हो जाता है। इससे गाड़ी को नुकसान हो सकता है।

Ladu Singh Khangarot, अध्यक्ष, Rajasthan Petroleum Dealers Association, जयपुर जिला



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