इस बार दशहरा या दिवाली पर काजू कतली का डिब्बा या मेवे की पोटली गिफ्ट करना महंगा पड़ सकता है। बीते चार महीने में ही काजू की कीमत में 80 फीसदी तक बढ़ोतरी हो गई है। वहीं बादाम भी 15 फीसदी महंगा हो गया है। देश में काजू-बादाम जैसे सूखे मेवों का पर्याप्त उत्पादन नहीं होता है। इसलिए इन मेवों को विदेशों से मंगाना पड़ता है। यदि सिर्फ काजू की बात करें तो यहां काजू की खपत पूरा करने के लिए 50 फीसदी से ज्यादा नट्स आयात करना होता है। यही हालत बादाम की भी है। कारोबारियों के अनुसार भारत में सूखे मेवों की खपत बढ़ी है, जबकि उत्पादन बढ़ नहीं रहा है। ऊपर से भारतीय रुपए के मुकाबले डॉलर महंगा हो रहा है। इस वजह से आयात महंगा पड़ रहा है। सूखे मेवे के कारोबारियों का कहना है कि दिवाली तक इन मेवों की कीमतों में 5 से 10 प्रतिशत की और वृद्धि होने के संकेत दिख रहे हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि स्थानीय बाजार में इनकी मांग बढऩे के बावजूद आयात में कमी आई है। जहां भारत दुनिया में काजू का सबसे बड़ा उपभोक्ता है। यहां जितनी काजू की खपत होती है, उतनी पैदावार है नहीं। इसलिए भारत अपनी काजू की लगभग 50 प्रतिशत जरूरत आयात के जरिए पूरी करता है। दुनिया में भारत काजू का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक और निर्यातक भी है। मतलब कि हम बाहर से कच्चा काजू मंगा कर उसकी प्रोसेसिंग करते हैं और फिर एक्सपोर्ट कर देते हैं। इस उद्योग के अनुमानों के अनुसार, काजू कतली, स्नैक्स, बिस्कुट जैसी मिठाइयों और करी जैसे खाना पकाने के खाद्य पदार्थों में लगभग 60 प्रतिशत काजू का उपयोग किया जाता है। हालांकि मिठाई या बिस्कुट या खाना पकाने में दो टुकड़ा और चार टुकड़ा काजू का उपयोग होता है। टुकड़ा काजू संपूर्ण काजू के मुकाबले सस्ता मिलता है। काजू की कमी और खपत में वृद्धि के कारण कीमतें बढ़ रही हैं। अक्टूबर तक काजू की कीमतों में 5-10 प्रतिशत की और वृद्धि हो सकती है। काजू की कीमतों में तेजी के कारण बादाम की कीमतों में भी तेजी आई है।जल्द ही कच्चे माल की कीमतों में वृद्धि का बोझ उपभोक्ताओं पर पडऩे वाला है। वर्तमान में अधिकांश हलवाई (मिठाई निर्माता) काजू की कीमतों में वृद्धि को खुद झेल रहे हैं। हालांकि काजू की आपूर्ति की स्थिति तंग रहने की उम्मीद है, इसलिए कीमतों में वृद्धि करके लागत में कुछ वृद्धि उपभोक्ताओं पर डालनी पड़ सकती है।

