Sunday, June 28, 2026 |
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निजी बैंकों में वोटिंग अधिकार सीमा की समीक्षा के लिए सरकार बनाएगी समिति

by Business Remedies
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Review of Indian Banking Sector and Voting Rights Rules

New Delhi,

केंद्र सरकार बैंकिंग क्षेत्र में सुधार को लेकर एक महत्वपूर्ण कदम उठाने की तैयारी में है। खबरों के अनुसार, सरकार ‘विकसित भारत’ पहल के तहत एक उच्चस्तरीय समिति गठित करने जा रही है, जो निजी निवेशकों के लिए बैंकों में 26 प्रतिशत वोटिंग अधिकार की सीमा की समीक्षा करेगी।

निजी निवेशकों की भूमिका बढ़ाने पर विचार

यह प्रस्तावित समिति अभी औपचारिक रूप से गठित नहीं हुई है, लेकिन इसके गठन की प्रक्रिया जल्द शुरू हो सकती है। रिपोर्ट के मुताबिक, यह कदम खासतौर पर आईडीबीआई बैंक के निजीकरण में सामने आई चुनौतियों के बाद उठाया जा रहा है। संभावित निवेशकों ने अपनी हिस्सेदारी के अनुरूप अधिक नियंत्रण की मांग की थी, जिसे वर्तमान नियमों के कारण संभव नहीं हो पाया। इस समिति में भारतीय रिजर्व बैंक के अधिकारी और बड़े सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के वरिष्ठ अधिकारी शामिल हो सकते हैं। समिति के कार्यक्षेत्र को अगले तीन महीनों में अंतिम रूप दिया जा सकता है। इसका मुख्य उद्देश्य बैंकिंग क्षेत्र को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाना है।

कानून में बदलाव के बिना संभव नहीं संशोधन

वर्तमान नियमों के अनुसार, यदि वोटिंग अधिकार की सीमा 26 प्रतिशत से अधिक बढ़ानी है, तो इसके लिए बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 में संशोधन करना आवश्यक होगा। ऐसे किसी भी बदलाव पर संसद के अगले सत्र में विचार किया जा सकता है। मौजूदा व्यवस्था के तहत, कोई भी प्रवर्तक निजी बैंक में 26 प्रतिशत से अधिक हिस्सेदारी रख सकता है, लेकिन शेयरधारक बैठकों में उसका वोटिंग अधिकार 26 प्रतिशत तक ही सीमित रहता है। इसी प्रकार, विदेशी निवेशक बैंक की कुल इक्विटी में 74 प्रतिशत तक हिस्सेदारी रख सकते हैं, लेकिन उनके वोटिंग अधिकार भी 26 प्रतिशत तक ही सीमित रहते हैं।

वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा बढ़ाने की दिशा में पहल

समिति इस बात की भी जांच करेगी कि भारत का बैंकिंग क्षेत्र वैश्विक स्तर पर अधिक प्रतिस्पर्धी कैसे बन सकता है। इसका व्यापक लक्ष्य यह है कि भारत के कम से कम दो बैंक दुनिया के शीर्ष 20 बैंकों में शामिल हो सकें। इस प्रस्तावित बदलाव का असर भविष्य में stock market update पर भी देखने को मिल सकता है, क्योंकि इससे बैंकिंग क्षेत्र में निवेशकों की रुचि बढ़ सकती है और निजीकरण की प्रक्रिया को गति मिल सकती है।



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