वन्य जीवों की कई प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गई है। जो कि चिंता का विषय बना हुआ है। ऐसे में इनके संरक्षण की महत्ती आवश्यकता हो गई है। जहां वर्ष,1970 से 2020 के बीच वन्यजीव आबादी में 73 फीसदी की गिरावट आई है। यह गिरावट स्तनधारियों, पक्षियों, उभयचरों, सरीसृपों और मछलियों सहित विभिन्न जीवों में देखी गई है। कम से कम 4,500 बाघ जंगल में बचे हुए हैं, लेकिन इस प्रजाति को बचाने के लिए और अधिक काम करने की आवश्यकता है, जो अभी भी विलुप्त होने के खतरे में है। बाघ सबसे सम्मानित जानवरों में से एक हो सकते हैं। ब्रिटिश काल से ही भारत में वन्य जीवों को सुरक्षा प्रदान करने और बचाने के लिए कानूनी प्रावधान किए जाते रहे हैं। हर दो साल में प्रकाशित होने वाली इस रिपोर्ट में बताया गया है कि वन्य जीवों की आबादी दुनियाभर में कैसे प्रभावित हो रही है। ‘प्रदूषण मुक्त सांसें’ पुस्तक के अनुसार वन्य जीवों को विलुप्त होने से बचाने के लिए देश में सबसे पहले वर्ष 1872 में ब्रिटिश शासनकाल में ‘वाइल्ड एलीकेंट प्रोटेक्शन एक्ट’ बनाया गया था। उसके बाद वर्ष,1927 में वन्य जीवों के शिकार और वनों की अवैध कटाई को अपराध मानते हुए ‘भारतीय वन अधिनियम’ अस्तित्व में आया, जिसके तहत सजा का प्रावधान किया गया। देश की आजादी के बाद वर्ष 1956 में ‘भारतीय वन अधिनियम’ पारित किया गया और 1972 में देश में वन्य जीवों को सुरक्षा प्रदान करने तथा अवैध शिकार, तस्करी और अवैध व्यापार को नियंत्रित करने के उद्देश्य से ‘वन्य जीव (संरक्षण) अधिनियम 1972’ लागू किया गया। वर्ष,1983 में वन्य जीव संरक्षण के लिए ‘राष्ट्रीय वन्य जीव योजना’ शुरू की गई, जिसके तहत वन्य जीवों को इंसानी अतिक्रमण से दूर रखने और उनकी सुरक्षा के लिए राष्ट्रीय पार्क और वन्य प्राणी अभयारण्य बनाए गए। जनवरी, 2003 में वन्य जीव संरक्षण अधिनियम में संशोधन किया गया और अधिनियम के तहत अपराधों के लिए जुर्माना तथा सजा को अधिक कठोर बना दिया गया। बहरहाल, प्रत्येक व्यक्ति के लिए यह समझना बेहद जरूरी है कि वन्य जीवों का संरक्षण हम सभी की बहुत बड़ी जिम्मेदारी है क्योंकि वन्य प्राणियों की विविधता से ही धरती का प्राकृतिक सौन्दर्य है, इसलिए लुप्तप्राय पौधों और जीव-जंतुओं की अनेक प्रजातियों की उनके प्राकृतिक निवास स्थान के साथ रक्षा करना पर्यावरण संतुलन के लिए भी बेहद जरूरी है।

