Thursday, September 17, 2026 |
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महंगाई की मार: जेब से अर्थव्यवस्था तक

by Business Remedies
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पिछले दो-तीन महीनों से महंगाई का बढऩा महज आंकड़ों में दर्ज होने वाली आर्थिक खबर नहीं है। यह रसोई से लेकर बाजार और परिवार के बजट से लेकर देश की आर्थिक रफ्तार तक अपना असर छोड़ती है। थोक और खुदरा कीमतों में लगातार बढ़ोतरी आम आदमी के लिए सबसे बड़ी चिंता इसलिए है, क्योंकि उसकी आय उतनी तेजी से नहीं बढ़ती, जितनी तेजी से रोजमर्रा की जरूरतों की कीमतें बढ़ जाती हैं। नतीजा साफ है—बजट बिगड़ता है, बचत घटती है और परिवारों को अपनी प्राथमिकताएं बदलनी पड़ती हैं। महंगाई का दायरा यहीं खत्म नहीं होता। जब कच्चा माल, ईंधन, परिवहन और उत्पादन की लागत बढ़ती है, तो उसका बोझ अंतत: उपभोक्ता तक पहुंचता है। लगातार बढ़ती महंगाई उपभोक्ता की क्रयशक्ति को कमजोर कर सकती है। मांग में कमी आने पर कारोबार और निवेश प्रभावित हो सकते हैं। वहीं महंगाई पर नियंत्रण के लिए ब्याज दरों में सख्ती की जरूरत पडऩे पर कर्ज महंगा हो सकता है। इसका असर आवास, वाहन, उद्योग और निजी निवेश जैसे क्षेत्रों पर पड़ सकता है। यानी महंगाई का दबाव लंबे समय तक बना रहे तो आर्थिक विकास की गति पर भी असर पडऩे की संभावना रहती है। ऐसे में सरकार की जिम्मेदारी केवल महंगाई के आंकड़े जारी होने का इंतजार करना नहीं, बल्कि उसके कारणों पर समय रहते कार्रवाई करना है। खाद्य वस्तुओं की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करने, जमाखोरी और कालाबाजारी पर प्रभावी अंकुश लगाने तथा आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति सुचारु रखने जैसे कदम जल्द राहत दे सकते हैं। जरूरत पडऩे पर आयात-निर्यात नीति में भी समयानुकूल बदलाव किया जाना चाहिए। वहीं स्थायी समाधान के तहत कृषि उत्पादन बढ़ाने के साथ भंडारण, कोल्ड-चेन, परिवहन और वितरण तंत्र को मजबूत करना होगा। महंगाई को पूरी तरह समाप्त करना संभव तो नहीं है, पर अनियंत्रित महंगाई को रोकना नीति-निर्माताओं की प्राथमिक जिम्मेदारी अवश्य होनी चाहिए। आम आदमी की क्रयशक्ति सुरक्षित रहेगी, तभी बाजार में मांग और अर्थव्यवस्था में विकास की गति भी कायम रह सकेगी।



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