कला, शिल्प, विज्ञान, इतिहास और सामाजिक प्रभाव को सम्मान देने के लिए आज विश्व फोटोग्राफी दिवस मनाया जाएगा। यह दिवस दुनिया भर के फोटोग्राफरों को अपनी अनूठी नजर से दुनिया को दिखाने के लिए प्रेरित करता है। डिजिटल युग में फोटोग्राफी के साथ एक नई चुनौती भी आई है। इसका भी हम सभी को समाधान निकालना जरूरी है। एआईऔर फोटो एडिटिंग तकनीक के कारण वास्तविक और कृत्रिम तस्वीर में अंतर करना कठिन होता जा रहा है। इसलिए आज फोटोग्राफी दिवस केवल अच्छी तस्वीर लेने की कला का उत्सव नहीं, बल्कि दृश्य साक्षरता स्रोत की जांच और जिम्मेदार तस्वीर साझा करने की याद दिलाने का अवसर भी है। स्मार्टफोन, डिजिटल कैमरे, सोशल मीडिया और कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने तस्वीर लेने और साझा करने की प्रक्रिया को अत्यंत आसान बना दिया है। फोटोग्राफी व्यक्तिगत अभिव्यक्ति से लेकर पत्रकारिता, शिक्षा, विज्ञापन, पर्यटन, विज्ञान और सामाजिक अभियानों तक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। फोटोग्राफी केवल किसी दृश्य को कैमरे में कैद करना नहीं है। यह समय, समाज, संस्कृति और मानवीय भावनाओं को सुरक्षित रखने का माध्यम है। इसके अलावा यह इतिहास का दस्तावेजीकरण, स्मृतियों का संरक्षण, कला और रचनात्मकता को प्रोत्साहन, समाज की अवाज तथा प्रकृति व वन्यजीव संरक्षण जागरूकता की भावना पैदा करती है। विश्व फोटोग्राफी दिवस को वैश्विक स्तर पर लोकप्रिय बनाने में भारतीय फोटोग्राफर और शिक्षक ओ. पी. शर्मा की भी महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है। उन्होंने 1988 में इस दिवस की अवधारणा पर काम शुरू किया और 1991 में भारत में इसका पहला आयोजन किया। बाद में यह पहल अंतरराष्ट्रीय फोटोग्राफी समुदाय तक पहुंची। इस दिवस का संबंध फोटोग्राफी की शुरुआती महत्वपूर्ण तकनीकों में से एक डागेरियोटाइप से है। फ्रांसीसी आविष्कारक लुई डागेर ने इस प्रक्रिया को विकसित किया था। 19 अगस्त,1839 को फ्रांसीसी सरकार ने डागेरियोटाइप प्रक्रिया को सार्वजनिक रूप से घोषित किया और इसे दुनिया के लिए एक तरह का मुफ्त उपहार बताया।

