अंगदान के प्रति जागरूकता बढ़ाने, अंगदान से जुड़े भ्रम दूर करने और लोगों को अंगदान का संकल्प लेने के लिए प्रेरित करने के उद्देश्य को लेकर आज विश्व अंग दिवस मनाया जाएगा। अंगदान एक नेक कार्य है, जो किसी की जान बचा सकता है और उसे जीने का दूसरा मौका दे सकता है। अंगदान किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसके स्वस्थ अंगों को जरूरतमंद मरीजों के प्रत्यारोपण के लिए दान करने की प्रक्रिया है। इसके माध्यम से हृदय, गुर्दे, यकृत, फेफड़े और अग्न्याशय जैसे महत्वपूर्ण अंगों से गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीजों को नया जीवन मिल सकता है। अंग प्रत्यारोपण की आधुनिक चिकित्सा ने 20वीं शताब्दी में तेजी से विकास किया। जैसे-जैसे प्रत्यारोपण तकनीक बेहतर हुई, वैसे-वैसे अंगों की उपलब्धता और लोगों में जागरूकता महत्वपूर्ण मुद्दे बन गए। भारत के संदर्भ में सरकार ने अंगदान और प्रत्यारोपण को व्यवस्थित करने के लिए संस्थागत व्यवस्था विकसित की है। वर्ष, 1954 में पहला सफल अंग प्रत्यारोपण हुआ। जब रोनाल्ड ली हेरिक ने अपने जुड़वां भाई रिचर्ड को एक गुर्दा दान किया, जो गंभीर गुर्दे की बीमारी से पीडि़त थे। वर्ष,1990 में शरीर विज्ञान या चिकित्सा में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह दिवस डॉ. क्रिस्टियान बर्नार्ड की याद में मनाया जाता है, जिन्होंने 1967 में दुनिया का पहला मानव से मानव हृदय प्रत्यारोपण किया था। इस तिथि को प्रत्यारोपण चिकित्सा में इस तरह की उपलब्धियों का सम्मान करने और विश्व भर में अंगों की कमी के बारे में चर्चा को जीवित रखने के लिए चुना गया था। विश्व अंगदान दिवस का महत्व इस बात में है कि अंग की आवश्यकता वाले रोगियों की संख्या और वास्तव में उपलब्ध अंगों की संख्या के बीच बहुत बड़ा अंतर है। प्रतिदिन प्रतीक्षा सूची में शामिल कई मरीज केवल इसलिए अपनी जान गंवा बैठते हैं क्योंकि समय पर उनके लिए उपयुक्त अंग नहीं मिल पाता। जागरूकता अभियान इस अंतर को कम करने की दिशा में पहला कदम है। अंगदान केवल अंगों का दान नहीं, किसी दूसरे इंसान को जीवन का अवसर देने का संकल्प है। चिकित्सा विज्ञान के इतिहास में सफल अंग प्रत्यारोपण ने हजारों गंभीर रोगियों को नया जीवन दिया है, जिसके बाद से वैश्विक स्तर पर इस दिशा में कार्य तेज किए गए।

