मिडिल ईस्ट में तनाव के कारण पिछले कुछ समय से डॉलर के मुकाबले रुपए की कीमतों में निरंतर गिरावट आ रही है। जो भारत के लिए चिंता का विषय बनता जा रहा है। रुपया कमजोर होने का मतलब है कि पहले जितने डॉलर खरीदने के लिए कम रुपए लगते थे, अब उतने ही डॉलर खरीदने के लिए ज्यादा रुपए देने पड़ रहे हैं। यानि अगर 1 डॉलर 75 रुपए से बढक़र 90 हो जाए, तो भारत के लिए आयात करना महंगा सौदा साबित होगा। रुपए में गिरावट आने से पेट्रोल-डीजल और ऊर्जा महंगी, ट्रांसपोर्ट खर्च बढ़ेगा, बिजली उत्पादन लागत बढ़ेगी, हर चीज के दाम बढ़ जाएंगे। ऐसे में भारत को ज्यादा से ज्यादा निर्यात बढ़ाने पर जोर देना चाहिए। ज्यादा वैल्यू वाले उत्पाद और सेवाएं निर्यात करने होंगे। इनमें इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर, रक्षा उत्पादन, ग्रीन टेक्नोलॉजी, आईटी और एआई सेवाएं प्रदान करनी होंगी। इसके अलावा तेल पर निर्भरता कम करनी होगी। सोलर ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहन व ग्रीन हाइड्रोजन पर ज्यादा से ज्यादा फोकस करना होगा। बाहर के देशों से जितना कम तेल आयात होगा, डॉलर की मांग उतनी कम होगी। भारत को घरेलू विनिर्माण मजबूत करना होगा। मेक इन इंडिया जैसी पहलुओं को मजबूत करना जरूरी है ताकि आयात कम हों। वहीं विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत रखना होगा। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया को पर्याप्त डॉलर रिजर्व बनाए रखना होता है ताकि जरूरत पडऩे पर बाजार में डॉलर उपलब्ध कराए जा सके। इसके अलावा रुपए में अंतरराष्ट्रीय व्यापार बढ़ाने पर ज्यादा जोर देना होगा। भारत कई देशों के साथ रुपए में व्यापार बढ़ाने की कोशिश कर रहा है ताकि हर बार डॉलर पर निर्भर ना रहना पड़े। निवेश और रोजगार बढ़ाने पर फोकस कर स्थिर नीतियां, बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर, स्किल डेवलपमेंट को बढ़ावा देना होगा। इनसे विदेशी और घरेलू निवेश बढ़ेगा। कुल मिलाकर कह सकते हैं कि रुपए की कमजोरी का सबसे बड़ा असर आम आदमी पर महंगाई के रूप में दिखता है।

