New Delhi,
देश की प्रमुख औषधि कंपनियों ने मधुमेह और मोटापे के इलाज को अधिक किफायती बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है। तीन भारतीय औषधि कंपनियों ने सेमाग्लूटाइड के जेनेरिक इंजेक्शन बाजार में उतारे हैं, जिससे मरीजों को कम लागत में उपचार का विकल्प मिल सकेगा। यह लॉन्च उस समय हुआ है जब इस दवा का पेटेंट समाप्त हो चुका है।
कई कंपनियों की एंट्री से बढ़ेगी प्रतिस्पर्धा
सन फार्मा, ज़ायडस लाइफसाइंसेज और डॉ. रेड्डीज़ लेबोरेटरीज ने अपने-अपने उत्पाद पेश किए हैं। इससे एक दिन पहले हैदराबाद की नाटको फार्मा ने भी अपना जेनेरिक सेमाग्लूटाइड इंजेक्शन भारतीय बाजार में लॉन्च किया था, जिसकी कीमत लगभग 1,290 रुपये प्रति माह रखी गई है। सन फार्मा ने सेमाग्लूटाइड को दो ब्रांड नामों—नोवेलट्रीट और सेमाट्रिनिटी—के तहत लॉन्च किया है। नोवेलट्रीट का उपयोग लंबे समय तक वजन नियंत्रण के लिए किया जाएगा और यह पांच अलग-अलग खुराक में उपलब्ध है। वहीं, सेमाट्रिनिटी उन मरीजों के लिए है जिनका टाइप 2 मधुमेह सही तरीके से नियंत्रित नहीं हो पा रहा है, और यह दो खुराक विकल्पों में उपलब्ध है। रिपोर्ट्स के अनुसार, नोवेलट्रीट की साप्ताहिक चिकित्सा लागत लगभग 900 रुपये से 2,000 रुपये के बीच है, जबकि सेमाट्रिनिटी की लागत 750 रुपये से 1,300 रुपये के बीच बताई गई है।
ज़ायडस का मल्टी-डोज पेन डिवाइस
ज़ायडस लाइफसाइंसेज ने अपने सेमाग्लूटाइड इंजेक्शन को पुनः उपयोग योग्य मल्टी-डोज पेन डिवाइस में पेश किया है। इसे सेमाग्लिन, माशेमा और ऑल्टरमी नामों से बेचा जा रहा है, जो टाइप 2 मधुमेह और मोटापे दोनों के उपचार में उपयोगी हैं। इसकी औसत मासिक उपचार लागत करीब 2,200 रुपये बताई गई है। डॉ. रेड्डीज़ लेबोरेटरीज ने ओबेडा नाम से अपना उत्पाद लॉन्च किया है, जिसे भारत का पहला डीसीजीआई-स्वीकृत जेनेरिक सेमाग्लूटाइड बताया गया है। यह दवा 2 मिलीग्राम और 4 मिलीग्राम की प्री-फिल्ड डिस्पोजेबल पेन में उपलब्ध है, जिसे सप्ताह में एक बार उपयोग किया जाता है। इसकी कीमत लगभग 4,200 रुपये प्रति माह रखी गई है।
कैसे काम करती है यह दवा
सेमाग्लूटाइड जीएलपी-1 रिसेप्टर एगोनिस्ट वर्ग की दवा है, जो रक्त शर्करा को नियंत्रित करने और वजन प्रबंधन में मदद करती है। इस दवा का वैश्विक स्तर पर प्रभावी उपयोग साबित हो चुका है। भारत का औषधि उद्योग तेजी से बढ़ रहा है। वर्ष 2024–25 में देश का औषधि निर्यात 9.4 प्रतिशत बढ़कर 30.47 अरब डॉलर तक पहुंच गया। सरकार के सहयोग से यह उद्योग 2026–27 तक दो अंकों की वृद्धि हासिल करने की तैयारी कर रहा है। वर्तमान में लगभग 60 अरब डॉलर मूल्य का यह क्षेत्र वर्ष 2030 तक बढ़कर 130 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। भारत दवाओं के उत्पादन के मामले में विश्व में तीसरे स्थान पर है और 200 से अधिक देशों को अपने उत्पाद निर्यात करता है।

