भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से पिछले दिनों की गई रेपो दर में कटौती आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने वाला महत्वपूर्ण कदम है। तीन बार शीर्ष बैंक ने फरवरी से रेपो दर में ६.५० फीसदी से ६.२५ फीसदी की है। वहीं अप्रैल में ०.२५ फीसदी की कटौती की। इस बार उम्मीद से अधिक ०.५ फीसदी की कमी कर ५.५० फीसदी कर दी है। भविष्य की मौद्रिक नीति आने वाले आंकड़ों पर ही निर्भर करेगी। इससे ब्याज दर में कटौती का सकारात्मक प्रभाव आर्थिक वृद्धि पर पड़ेगा। जहां बैंकों की उधार लेने की लागत कम हो जाएगी, जिससे उपभोक्ताओं और फर्मों की उधार दरों में कमी आ जाएगी। गृह या व्यक्तिगत ऋण जैसे ऋण लेने वाले उधारकर्ता कम ईएमआई का लाभ उठा सकते हैं। यूं कहे कि इससे व्यक्तिगत, आवास, वाहन और व्यावसायिक ऋणों पर ब्याज दरें कम हो जाएगी। इसका सीधा असर उपभोक्ता वस्तुओं की मांग में इजाफा होगा तथा एमएसएमई और स्टार्टअप को ज्यादा कर्ज मिलने से सहारा मिलेगा। ज्यादा से ज्यादा निवेशक, निवेश को प्रेरित होंगे और रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। एक ओर जहां रेपो दर भारतीय मौद्रिक नीति का एक शक्तिशाली अंग है, जो देश की मुद्रा आपूर्ति, मुद्रास्फीति के स्तर और तरलता को नियंत्रित कर सकता है। दूसरी ओर रेपो के स्तर का बैंकों के लिए उधार लेने की लागत पर सीधा प्रभाव पड़ता है। तकनीकी रूप से रेपो का मतलब पुनर्खरीद विकल्प या पुनर्खरीद समझौता है। यह एक ऐसा समझौता है जिसमें बैंक रातोंरात ऋण लेते समय आरबीआई को ट्रेजरी बिल जैसी योग्य प्रतिभूतियां प्रदान करते हैं। उन्हें पूर्व निर्धारित मूल्य पर पुनर्खरीद करने का समझौता भी होगा। इस प्रकार बैंक को नकद और केंद्रीय बैंक को सुरक्षा मिलती है। मुद्रास्फीति के उच्च स्तर के दौरान रिजर्व बैंक अर्थव्यवस्था में धन के प्रवाह को कम करने के लिए कड़े प्रयास करता है। जहां अधिक ऋण वितरण से एनपीए बढऩे का खतरा भी है। ऐसे में रिजर्व बैंक को महंगाई और वित्तीय स्थिरता में संतुलन बनाए रखने के लिए सतर्क रहना होगा।

