Sunday, July 19, 2026 |
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पहला निजी रॉकेट ‘विक्रम-1’ लॉन्च

अंतरिक्ष में अपनी तय कक्षा सफलतापूर्वक हासिल कर रचा इतिहास, भारत दुनिया का तीसरा देश बना

by Business Remedies
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नई दिल्ली | बीआर नेटवर्क
भारत का पहला निजी तौर पर विकसित ऑर्बिटल-क्लास रॉकेट ‘विक्रम-1’ शनिवार को श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से प्रक्षेपित किया गया। ‘विक्रम-1’ ने अंतरिक्ष में अपनी तय कक्षा (ऑर्बिट) सफलतापूर्वक हासिल कर ली है। इस ऐतिहासिक कामयाबी के साथ ही भारत, निजी क्षेत्र में ऑर्बिटल लॉन्च (कक्षीय प्रक्षेपण) की क्षमता हासिल करने वाला दुनिया का तीसरा देश बन गया है। इस रॉकेट को हैदराबाद स्थित स्काईरूट एयरोस्पेस ने विकसित किया है। रॉकेट ने अपने अंतिम बर्न (ईंधन दहन चरण) को पूरा करते हुए पेलोड्स को पृथ्वी से लगभग 450 किलोमीटर की ऊंचाई पर स्थापित कर दिया।
पूरा रॉकेट मजबूत कार्बन-कंपोजिट से बना है
विक्रम-1 पूरी तरह से हल्के और मजबूत कार्बन-कंपोजिट स्ट्रक्चर से बना पहला ऑर्बिटल रॉकेट है। कार्बन फाइबर स्टील की तुलना में पांच गुना हल्का होता है। इससे रॉकेट का वजन कम हो जाता है, जिससे इसकी ईंधन दक्षता बढ़ जाती है। रॉकेट को ऊर्जा देने के लिए इसमें तीन सॉलिड-फ्यूल स्टेज और एक लिक्विड ऑर्बिटल एडजस्टमेंट मॉड्यूल दिया गया है।
1. तीन सॉलिड-फ्यूल स्टेज
इसे रॉकेट के नीचे लगे तीन बेहद ताकतवर ‘बूस्टर्स’ की तरह समझ सकते हैं, जिनमें ठोस ईंधन जैसे बारूद की तरह का ठोस केमिकल भरा होता है। रॉकेट को जमीन से उठाकर आसमान की तरफ धकेलने के लिए शुरुआत में बहुत भारी ताकत की जरूरत होती है। ये तीनों सॉलिड स्टेज एक-एक करके जलते हैं और रॉकेट को शुरुआती धक्का देकर अंतरिक्ष की सीमा लो अर्थ ऑर्बिट के पास पहुंचा देते हैं।
2. लिक्विड ऑर्बिटल एडजस्टमेंट मॉड्यूल
यह रॉकेट के ऊपरी हिस्से में लगा एक बेहद बारीक और स्मार्ट तरल ईंधन वाला छोटा इंजन होता है। जब रॉकेट अंतरिक्ष में पहुंच जाता है, तो वहां ठोस ईंधन काम नहीं आता क्योंकि उसे अपनी मर्जी से ऑन या ऑफ नहीं किया जा सकता। यहां ‘लिक्विड मॉड्यूल’ काम आता है। यह अंतरिक्ष में सैटेलाइट को सही दिशा देने, रॉकेट की रफ्तार कम-ज्यादा करने और सैटेलाइट को उसकी तय की गई कक्षा में ‘एडजस्ट’ यानी स्थापित करने का काम करता है।
बेहद आधुनिक रॉकेट है ‘विक्रम-1’
स्काईरूट एयरोस्पेस का बनाया ‘विक्रम-1’ एक बेहद आधुनिक रॉकेट है। यह अपने साथ 350 किलोग्राम तक का वजन लेकर अंतरिक्ष की निचली कक्षा (लो अर्थ ऑर्बिट) में जा सकता है। यह रॉकेट सैटेलाइट्स को अंतरिक्ष में उनकी सही जगह पर पहुंचाएगा, जिससे हमारे मोबाइल नेटवर्क, इंटरनेट, नेविगेशन और मौसम की जानकारी जैसी सेवाओं को मजबूती मिलेगी। इस रॉकेट को बनाने में खास कार्बन बॉडी और 3डी-प्रिंटेड लिक्विड इंजन जैसी आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया गया है। अपने पहले मिशन में यह कई कस्टमर पेलोड को 450 किलोमीटर की कक्षा (ऑर्बिट) में स्थापित करेगा। इनमें स्काईरूट का स्कोप सैटेलाइट, डीक्यूब्ड का टेक्नोलॉजी डेमोंस्ट्रेशन पेलोड, ग्रह स्पेस का सोलर्स एस 3 सैटेलाइट और कॉस्मोसर्व स्पेस का ‘इमब्रेस’ रोबोटिक आर्म शामिल हैं, जिसे ऑर्बिटल मलबे को पकडऩे के लिए डिजाइन किया गया है।
कुछ खास पेलोड भी ले जाए जाएंगे
इस उड़ान में कुछ खास पेलोड भी ले जाए जाएंगे, जैसे कॉस्मिक ब्लूम नाम की फूलों के आकार की कलाकृति और 18-कैरेट सोने का एक माइक्रो-रॉकेट, जिस पर वैज्ञानिक सी.वी. रमन, विक्रम साराभाई और ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की सूक्ष्म मूर्तियां बनी हुई हैं।



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