नई दिल्ली | बिजनेस रेमेडीज | विश्व बाजार में एक बार फिर कच्चे तेल की कीमतों में तगड़ा उछाल आया है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य टकराव, हमलों और Strait of Hormuz की समुद्री राह पर खतरे के कारण तेल की कीमतें 80 से 90 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह उछाल वैश्विक महंगाई को नई लहर दे सकता है, खासकर तेल आयातक देशों जैसे भारत में। आज भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में Brent Crude के दाम 89 डॉलर प्रति बैरल रहे, तो वहीं WTI के दाम भी 83.07 डॉलर प्रति बैरल रहे।
तेल की कीमतों में उबाल
हालिया रिपोर्ट्स के अनुसार, Brent Crude 88-90 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गया है, जबकि WTI Crude के दाम 83 डॉलर प्रति बैरल के आसपास चल रहे हैं। पिछले कुछ हफ्तों में कीमतों में 10-16 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। अमेरिका के ईरान पर हमलों और ईरान की जवाबी कार्रवाइयों के कारण Strait of Hormuz — जहां विश्व के लगभग 20-30 प्रतिशत तेल का परिवहन होता है — में तनाव बढ़ गया है। यह जलडमरूमध्य खाड़ी से तेल निर्यात का प्रमुख रास्ता है। यदि यहां पूर्ण व्यवधान हुआ तो रोजाना 13-20 मिलियन बैरल तेल की सप्लाई प्रभावित हो सकती है। इससे कीमतें 100 डॉलर या उससे ऊपर जा सकती हैं। हाल ही में युद्धविराम की कोशिशों के बावजूद टकराव जारी है, जिससे बाजार में अनिश्चितता बनी हुई है।
भारत पर असर
भारत अपनी 85-88 प्रतिशत कच्चे तेल की जरूरत आयात से पूरी करता है। हाल के आंकड़ों में अप्रैल-जून तिमाही में तेल आयात बिल पिछले साल से 60 प्रतिशत ज्यादा हो गया। विशेषज्ञों के मुताबिक, Brent Crude 90 डॉलर पार करने से भारत में महंगाई का खतरा बढ़ेगा, रुपया कमजोर हो सकता है। RBI के पुराने अनुमानों के अनुसार, 10 प्रतिशत तेल महंगाई से CPI महंगाई में 30 BPS (0.3 प्रतिशत) बढ़ोतरी और GDP वृद्धि में 15 BPS की कमी आ सकती है। इससे खाद्य महंगाई, परिवहन लागत और औद्योगिक उत्पादन प्रभावित होंगे। सरकार पहले से ही सब्सिडी और बफर स्टॉक के जरिए दबाव कम करने की कोशिश कर रही है, लेकिन लंबा संघर्ष चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है।
महंगाई का डर लगातार बढ़ रहा
तेल महंगा होने से पूरे अर्थव्यवस्था पर असर पड़ता है—
- परिवहन और ईंधन : पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ती हैं, जो माल ढुलाई, लॉजिस्टिक्स और आम उपभोक्ता को सीधे प्रभावित करती हैं।
- उद्योग और खाद्य : विनिर्माण, रसायन और कृषि उत्पादन की लागत बढ़ती है, जिससे खाद्य पदार्थों समेत हर चीज महंगी हो जाती है।
- वैश्विक असर : IMF के अनुसार, तेल की कीमतों में 10 प्रतिशत सतत बढ़ोतरी से वैश्विक महंगाई में 0.4 प्रतिशत की वृद्धि हो सकती है, साथ ही GDP वृद्धि पर 0.1-0.2 प्रतिशत का नकारात्मक प्रभाव।
Goldman Sachs जैसे संस्थान 0.3 प्रतिशत GDP गिरावट और 0.5-0.6 प्रतिशत अतिरिक्त महंगाई का अनुमान लगा रहे हैं। New Zealand में हाल ही में ईंधन की वजह से मुद्रास्फीति 4.1 प्रतिशत पर पहुंच गई है। इसी तरह Europe और अन्य आयातक देशों में चिंता बढ़ रही है।

