पिछले हफ्ते अमेरिका सहित दुनिया भर के शेयर बाजारों में जो गिरावट शुरू हुई, उसका असर गतदिनों भारतीय बाजार पर दिखा। अमेरिका में बिकवाली वहां इकोनॉमी के मंदी में फंसने के डर से शुरू हुई। इस बीच, इजराइल-ईरान के बीच युद्ध की आशंका ने भी ग्लोबल सेंटिमेंट खराब किया है। अमेरिकी मार्केट में इससे पहले जो तेजी चली आ रही थी, वह ज्यादातर टेक्नोलॉजी कंपनियों तक ही सीमित थी। वह भी इस वजह से क्योंकि आर्टिफिशल इंटेलिजेंस की बदोलत इनकी ग्रोथ तेज बने रहने की भविष्यवाणियां की जा रही थीं, लेकिन जून तिमाही के इन कंपनियों के रिजल्ट आए तो उससे मार्केट को निराशा हाथ लगी। वहीं अमेरिका में मंदी का डर बढऩे से वहां के केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व की पॉलिसी को लेकर भी सवाल पूछे जा रहे हैं। सवाल यह है कि क्या उसे ब्याज दरों में कटौती शुरू कर देनी चाहिए थी? वैसे, मंदी का डर बढऩे के बाद फेडरल रिजर्व कह चुका है कि वह जल्द ब्याज दरों में कटौती शुरू करेगा। मार्केट पर जापानी की मुद्रा येन में आई गिरावट का भी असर हो रहा है। बैंक ऑफ जापान ने हाल ही में ब्याज दरें बढ़ाई हैं। असल में बड़े विदेशी निवेशक वहां बेहद कम ब्याज दरों पर कर्ज लेकर उसे भारत सहित दुनिया के दूसरे बाजारों में लगाते हैं। इसे येन कैरी ट्रेड कहा जाता है। ब्याज दरों में बढ़ोतरी और येन में आई गिरावट की वजह से अब ऐसे सौदे काटे जा रहे हैं। इससे भी मार्केट पर दबाव बढ़ा है। ग्लोबल बिकवाली की वजह से भारतीयों बाजार पर भले ही दबाव बढ़ा है, लेकिन इसकी तुलना अमेरिका के टेक्नोलॉजी शेयरों में तेजी वाले मार्केट से नहीं की जा सकती। अव्वल तो भारतीय इकोनॉमी बेहद मजबूत है। पिछले वित्त वर्ष में जीडीपी ग्रोथ 8.2 फीसदी रही, जो दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेज थी। इस वित्त वर्ष में भी उसका यह दर्जा बना रह सकता है। बड़ी बात यह भी है कि भारतीय बाजार की विदेशी निवेशकों पर निर्भरता बेहद कम हो गई है और डोमेस्टिक इन्वेस्टर्स इसकी ताकत बने हुए हैं। वैसे यह बात सही है कि भारतीय बाजार का वैल्यूएशन कुछ अधिक हो गया था, लेकिन किसी भी हाई ग्रोथ मार्केट को अक्सर ऊंचा वैल्यूएशन मिलता है। भारतीय कंपनियों की मुनाफे में बढ़ोतरी की रफ्तार को देखें तो यह वैल्यूएशन अधिक नहीं लगता। इसलिए भारतीय निवेशकों को इस गिरावट से घबराना नहीं चाहिए। अगर उन्होंने लंबी अवधि के लिए क्वॉलिटी स्टॉक्स में निवेश किया है तो उनके पैसा बनाने की संभावना बनी रहेगी। लेकिन यह भी सच है कि दुनिया भर के बाजारों में बिकवाली के असर से भारतीय बाजार बचे नहीं रह सकते।

