दो देशों में बढ़ते तनाव से जहां अर्थव्यवस्था पर तो असर पड़ता ही है, साथ ही इससे अन्य देश भी इससे प्रभावित होते हैं। भारत और पाकिस्तान के बीच बढ़ते तनाव ने जहां भारत की अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया है। इससे व्यापार, निवेश और बाजार स्थिरता में बाधा आई है। तनाव के बीच क्षेत्रीय ऊर्जा मार्गों और शिपिंग लेन के लिए खतरा पैदा होने की उम्मीद है। तेल आयात पर भारत की निर्भरता को देखते हुए किसी भी वृद्धि के परिणामस्वरूप कच्चे तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं और मुद्रास्फीति का दबाव बढ़ सकता है। वहीं अफगानिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल, म्यांमार और भूटान जैसे पड़ोसी देशों के लिए भारत और पाकिस्तान के बीच जारी तनाव कई मायनों में काफी महत्वपूर्ण है। अगर तनाव लंबे दिन तक चलता है तो अलग-अलग पड़ोसियों पर इसका अलग-अलग असर होगा। जहां नेपाल का भारत के साथ 60 फीसदी ट्ऱेड होता है, वह प्रभावित हो सकता है। पोर्ट और ट्रेड रूट के मामले में नेपाल को परेशानी हो सकती है। नेपाल और भारत के बीच लंबी सीमा है और नेपाल चाहेगा कि यह तनाव कम हो, जबकि चीन इस स्थिति का फायदा नेपाल के साथ संबंध को आगे बढ़ाने में कर सकता है। वहीं ऐसा ही आर्थिक संकट भूटान के साथ हो सकता है, क्योंकि भारत की अर्थव्यवस्था पर प्रभाव पड़ा तो भूटान का पर्यटन उद्योग भी प्रभावित होगा। वहीं बढ़ते संघर्ष और वैश्विक कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों को लेकर निवेशकों की चिंताओं के कारण भारतीय इक्विटी सूचकांकों में गिरावट आई है। कई विश्लेषकों ने यह भी दांवा किया है कि निरंतर शत्रुता बाजार के प्रदर्शन को और भी कम कर सकती है और विदेशी निवेश को रोक सकती है। लंबे समय तक संघर्ष से बुनियादी ढांचे की निवेश योजनाएं पटरी से उतर सकती हैं, आपूर्ति श्रृंखलाएं बाधित हो सकती हैं और कारोबारी विश्वास कमजोर हो सकता है। इसके अलावा रक्षा मद में अधिक खर्च होने से भारत की राजकोषीय मजबूती प्रभावित हो सकती है और राजकोषीय समेकन की रफ्तार सुस्त पड़ सकती है। भारत में महत्वपूर्ण निवेश वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपनी निवेश रणनीतियों का पुनर्मूल्यांकन कर सकती हैं, जिससे आर्थिक विकास धीमा हो सकता है।

