जयपुर,
भारत के जैव ऊर्जा क्षेत्र में अब तक गीले जैविक अपशिष्ट के प्रबंधन और उपयोग को लेकर उल्लेखनीय प्रगति हुई है, लेकिन कठोर जैव द्रव्यमान आधारित कृषि अवशेष लंबे समय से इस दायरे से बाहर रहे हैं। नारियल के छिलके, काजू के छिलके तथा मूंगफली के छिलके जैसे कृषि अवशेषों के प्रभावी उपयोग की चुनौती को ध्यान में रखते हुए ऑर्गेनिक रीसाइक्लिंग सिस्टम्स लिमिटेड ने अपने वेस्ट-टू-वेल्यू मंच का विस्तार करते हुए संजीवक 2.0 पहल के तहत एक नई डाउनड्राफ्ट गैसीकरण पायलट परियोजना शुरू की है।
कंपनी के एनएबीएल-मान्यता प्राप्त ओआरएस अनुसंधान एवं नवाचार केंद्र, महापे, नवी मुंबई में 10 किलोग्राम प्रति घंटा क्षमता वाली डाउनड्राफ्ट गैसीकरण प्रणाली पर पायलट अध्ययन प्रारंभ किया गया है। यह एक उन्नत ताप-रासायनिक तकनीक है, जो नियंत्रित आंशिक ऑक्सीकरण प्रक्रिया के माध्यम से कठोर जैव द्रव्यमान को स्वच्छ संश्लेषित गैस और उच्च गुणवत्ता वाले जैव-कोयले में परिवर्तित करती है। विशेषज्ञों के अनुसार डाउनड्राफ्ट विन्यास को कम टार निर्माण की क्षमता के कारण चुना गया है, जो अन्य जैव द्रव्यमान रूपांतरण तकनीकों की तुलना में महत्वपूर्ण लाभ प्रदान करता है। इसके अलावा इस प्रणाली में स्व-ऊष्मीय डिज़ाइन अपनाया गया है, जिसके तहत एक बार प्रज्वलित होने के बाद रिएक्टर अपनी आवश्यक ऊष्मा स्वयं बनाए रखता है। इससे संचालन के दौरान किसी बाहरी ईंधन स्रोत की आवश्यकता नहीं पड़ती।
वर्तमान में अनुसंधान केंद्र चार प्रकार के कठोर जैव द्रव्यमान फीडस्टॉक पर परीक्षण कर रहा है, जिनमें कच्चे नारियल के छिलके, भूरे नारियल के छिलके, काजू के छिलके तथा मूंगफली के छिलके शामिल हैं। अध्ययन का मुख्य उद्देश्य प्रमुख परिचालन मापदंडों का मूल्यांकन और अनुकूलन करना है, ताकि अधिकतम मात्रा में उच्च गुणवत्ता वाला जैव-कोयला प्राप्त किया जा सके तथा उसमें स्थिर कार्बन की मात्रा भी बेहतर बनी रहे। कंपनी ने स्पष्ट किया है कि परियोजना फिलहाल मापदंड अनुकूलन चरण में है। इस स्तर पर किसी प्रकार के उत्पादन अथवा गुणवत्ता संबंधी परिणाम सार्वजनिक नहीं किए गए हैं। अनुसंधान दल विभिन्न परिचालन स्थितियों का विश्लेषण कर भविष्य के लिए एक मजबूत प्रक्रिया ढांचा विकसित करने पर कार्य कर रहा है।
ऑर्गेनिक रीसाइक्लिंग सिस्टम्स लिमिटेड के पूर्णकालिक निदेशक यशस भंड ने कहा कि नारियल और मूंगफली के छिलकों जैसे कठोर जैव द्रव्यमान अपशिष्ट भारत में कृषि अवशेषों की एक महत्वपूर्ण लेकिन उपेक्षित श्रेणी हैं। उनके अनुसार डाउनड्राफ्ट गैसीकरण इन अवशेषों को उच्च गुणवत्ता वाले जैव-कोयले और स्वच्छ संश्लेषित गैस में परिवर्तित करने का प्रभावी माध्यम बन सकता है। उन्होंने बताया कि अनुसंधान केंद्र चरणबद्ध और वैज्ञानिक तरीके से अध्ययन कर रहा है तथा यदि परिणाम सकारात्मक रहते हैं तो भविष्य में इस तकनीक के व्यावसायीकरण पर विचार किया जाएगा। ओआरएस अनुसंधान एवं नवाचार केंद्र की अनुसंधान एवं विकास प्रमुख डॉ. मंजू तंवर ने बताया कि कठोर जैव द्रव्यमान अपनी संरचना, घनत्व और रासायनिक संघटन के कारण विशिष्ट ताप-रासायनिक चुनौतियां प्रस्तुत करता है। उन्होंने कहा कि पायलट अध्ययन के दौरान समतुल्यता अनुपात, निवास समय तथा निष्कर्षण मात्रा जैसे प्रमुख परिचालन मापदंडों के प्रभाव का व्यवस्थित मूल्यांकन किया जा रहा है। इससे भविष्य में बड़े स्तर पर विस्तार और व्यावसायिक उपयोग के लिए उपयुक्त परिस्थितियों की पहचान करने में सहायता मिलेगी।
कंपनी का मानना है कि यदि यह पायलट परियोजना सफल रहती है और तकनीक का व्यावसायीकरण किया जाता है, तो इससे ईंधन और बिजली लागत में कमी लाने में मदद मिल सकती है। साथ ही कठोर जैव द्रव्यमान अपशिष्ट प्रबंधन से जुड़ी समस्याओं का समाधान तलाश रहे विभिन्न हितधारकों के लिए यह तकनीक उपयोगी विकल्प बन सकती है। यह परियोजना ओआरएस अनुसंधान एवं नवाचार केंद्र के विस्तारित अनुसंधान पोर्टफोलियो का महत्वपूर्ण हिस्सा है। वर्तमान में केंद्र जैव-कोयला, उन्नत उत्प्रेरक, कार्बन झिल्ली, कार्बन डाइऑक्साइड उपयोग तथा सूक्ष्म शैवाल आधारित उपचार प्रणालियों सहित विभिन्न क्षेत्रों में 7 से अधिक नवाचारों पर कार्य कर रहा है। उल्लेखनीय है कि केंद्र को फरवरी 2026 में आईएसओ/आईईसी 17025:2017 के अंतर्गत एनएबीएल मान्यता प्राप्त हुई थी।

