रूस-यूक्रेन युद्ध को रोकने के दावों में नाकाम रहने के बाद ट्रंप प्रशासन अपनी खिसियाट उन देशों पर दबाव बनाकर निकाल रहा है, जो रूस से कच्चा तेल खरीद रहे हैं। जिनमें भारत के साथ चीन व ब्राजील भी शामिल हैं। इसके लिये अमेरिका नाटो के दुरुपयोग से भी नहीं चूक रहा है। आखिर शेष विश्व के देशों के व्यापारिक मामलों में नाटो की दखल का क्या औचित्य है? नाटो महासचिव मार्क रूट्टे की रूसी तेल आयात संबंधी धमकी पर भारत द्वारा करारा जवाब दिया गया है, लेकिन इस घटनाक्रम ने एक बार फिर वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा पर पश्चिमी देशों के दोमुंहेपन को ही बेनकाब किया है। दरअसल, अपनी अमेरिका यात्रा के दौरान रूट्टे ने भारत, चीन और ब्राजील को चेतावनी दी है कि वे रूस पर यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने के लिये दबाव बनाएं, अन्यथा दंडात्मक व्यापार शुल्क का सामना करने के लिये तैयार रहें। निश्चित रूप से रूट्टे की यह टिप्पणी अमेरिका के रूसी प्रतिबंध अधिनियम, 2025 की दिशा में बढ़ते समर्थन के साथ मेल खाती है। यह एक विधेयक है, जिसे राष्ट्रपति ट्रंप और 171 सांसदों का समर्थन प्राप्त है। यह वही विधेयक है, जो रूस के तेल, गैस, यूरेनियम या पेट्रोकेमिकल्स का व्यापार करने वाले देशों पर पांच सौ फीसदी तक शुल्क लगाने का प्रस्ताव पेश करता है।
उल्लेखनीय है कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिये पूरी तरह से आयातित तेल पर निर्भर करता है। देश अपने कच्चे तेल का 88 फीसदी आयात करता है। जिसके चलते ही भारत ने पश्चिमी देशों के दोहरे मापदंड के प्रति ही आगाह किया है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने सीनेटर लिंडसे ग्राहम को नई दिल्ली की चिंताओं से अवगत कराया है। साथ ही भारत की वैध ऊर्जा आवश्यकताओं और अपनी आर्थिक दिशा स्वयं निर्धारित करने के संप्रभु अधिकार पर जोर दिया है। निश्चित रूप से दुनिया के तटस्थ और विकासशील देशों को पश्चिमी देशों की दादागीरी का पुरजोर विरोध करना चाहिए।

