कोरोना महामारी के बाद से लोगों की बैंकों में एफडी कराने की ओर से झुकाव कम हुआ है। इन दिनों काफी लोग बचत के लिए बैंकों से दूरी बना रहे हैं। इसकी जगह म्यूचुअल फंड जैसी कैपिटल मार्केट में निवेश करने का प्राथमिकता दे रहे हैं और इस ओर लगातार रूझान बढ़ता जा रहा है। लोगों को निवेश के लिए बैंक जैसे पारंपरिक साधन रास नहीं आ रहे हैं। शायद यही कारण है कि वे उससे दूरी बना रहे हैं। जहां पहले आम लोग परंपरागत रूप से अपनी बचत को निवेश करने के लिए बैंकों पर निर्भर थे, वे अब तेजी से कैपिटल मार्केट की ओर रुख कर रहे हैं। यह प्रवृत्ति घरेलू निवेशों जैसे म्यूचुअल फंड और अन्य बचत साधनों में दिखाई दे रही है। बैंक जमा का हिस्सा घट रहा है, क्योंकि परिवार तेजी से अपनी बचत म्यूचुअल फंड, बीमा फंड और पेंशन फंड में आवंटित कर रहे हैं। जहां डिपॉजिट ग्रोथ के मुकाबले क्रेडिट ग्रोथ बहुत ज्यादा नहीं होनी चाहिए। बैंकों ने अन्य सोर्सेज पर निर्भरता बढ़ाकर क्रेडिट और डिपॉजिट के अंतर को कम करने की कोशिश की है। इससे ब्याज दरों के प्रति उनकी संवेदनशीलता बढ़ जाती है और लिक्विडिटी मैनेजमेंट के लिए चुनौतियां पैदा होती हैं। पिछले दिनों हुए एक शिखर सम्मेलन में गवर्नर शक्तिकांत दास का भी कहना था कि माइक्रोफाइनेंस बैंक तय सीमा से अधिक ब्याज ले रहे हैं। बैंकों को ग्राहकों को जोडऩे की प्रक्रिया में सुधार की जरूरत है और बैंक,एनबीएफसीएस को साइबर सिक्योरिटीज पर और खर्च करने की जरूरत है। इसके अलावा ट्रांजेक्शन मॉनिटरिंग को मजबूत करने पर काम जारी रखा जाए। गवर्नर शक्तिकांत दास का कहना था कि केंद्रीय बैंक पूरी तरह आश्वस्त है कि वित्त वर्ष, 2024-25 में 7.2 प्रतिशत का आर्थिक विकास दर का अनुमान पूरा हो जाएगा। इसके अलावा कारोबारी घरानों को बैंक खोलने की अनुमति देने से हितों के टकराव और संबंधित पक्षों के लेनदेन से जुड़ा जोखिम बढ़ जाता है आरबीआई ने लगभग एक दशक पहले कई बड़े कारोबारी समूहों को नए बैंकों का लाइसेंस देने के अयोग्य घोषित कर दिया था।

