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Manipal Hospital ईएम बाईपास और मुकुंदपुर क्लस्टर ने 7 वर्षीय बच्चे को दुर्लभ और जानलेवा अग्न्याशय की चोट से समय पर ईआरसीपी प्रक्रिया द्वारा बचाया

by Business Remedies
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बिजऩेस रेमेडीज/कोलकाताट्रॉमा और बाल गॅस्ट्रोएन्टेरोलॉजी के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल करते हुए, Manipal Hospital ईएम बाईपास और मुकुंदपुर क्लस्टर के गैस्ट्रोएन्टेरोलॉजी विभाग के निदेशक डॉ. प्रदीप्त कुमार सेठी ने अपने विशेषज्ञ हस्तक्षेप से एक छोटे बच्चे की जान बचाई। यह बच्चा घर पर गंभीर और दुर्लभ अग्न्याशय की चोट का शिकार हो गया था। समय पर की गई जाँच और सटीक उपचार इस बच्चे की ज़िंदगी में निर्णायक मोड़ साबित हुआ।
यह बच्चा, दीप अधिकारी (नाम बदला हुआ), उम्र 7 वर्ष, कोलाघाट, पूर्व मेदिनीपुर का निवासी और कक्षा 1 का छात्र है। वह तब गंभीर रूप से घायल हो गया जब खेलते समय धातु की एक पुस्तक अलमारी उसके सीने और पेट पर गिर गई। पहले उसे एक स्थानीय अस्पताल ले जाया गया, जहाँ प्रारंभिक रिपोर्ट में यकृत की चोट का अनुमान लगाया गया। लेकिन हालत की गंभीरता को देखते हुए उसे तुरंत उन्नत उपचार के लिए मणिपाल अस्पताल मुकुंदपुर भेजा गया।
अस्पताल में आगे की जाँच में पता चला कि मामला और भी जटिल है। उन्नत जाँच जैसे सीटी स्कैन और एमआरसीपी से यह स्पष्ट हुआ कि अग्न्याशय की नली पूरी तरह से फट चुकी थी। इसके कारण अग्न्याशय का रस आँत तक पहुँचने के बजाय पेट में जमा हो रहा था, जो बेहद खतरनाक है और संक्रमण, अंगों की क्षति तथा मृत्यु तक का कारण बन सकता है।
स्थिति की गंभीरता देखते हुए इस मामले को डॉ. प्रदीप्त कुमार सेठी के पास भेजा गया। उन्होंने सावधानी से विचार करने के बाद ईआरसीपी द्वारा डक्ट में स्टेंट डालने का फ़ैसला लिया। यह अत्यंत जटिल लेकिन न्यूनतम कट-छाँट वाली प्रक्रिया है। बच्चे को Manipal Hospital मुकुंदपुर के बाल चिकित्सा आईसीयू में भर्ती किया गया। इस दौरान उनकी टीम के विशेषज्ञ डॉ. प्रसंता देबनाथ, डॉ. राहुल समंता और डॉ. पी कुमार ने पूरा सहयोग दिया। डॉ. प्रदीप्त कुमार सेठी ने बताया कि बच्चों में अग्न्याशय की नली का फटना बेहद दुर्लभ है। शल्यचिकित्सा से स्थिति बिगड़ सकती है, जबकि केवल दवाइयों पर छोड़ देने से घातक जटिलताएँ हो सकती हैं। ऐसे में ईआरसीपी और स्टेंटिंग ही एकमात्र उपाय था। प्रक्रिया कठिन थी, लेकिन इससे बच्चे को जीवित रहने का सबसे अच्छा अवसर मिला। ERPC के बाद बच्चे को बाल चिकित्सा आईसीयू में रखा गया, जहाँ डॉ. सौमेन मेउर (एचओडी व वरिष्ठ परामर्शदाता – बाल रोग) और डॉ. मनिदीपा दत्ता (परामर्शदाता – बाल रोग) ने देखभाल की। हालत बिगडऩे पर जब बच्चे का पेट फूलने लगा, तब डॉ. पार्थ प्रतिम सामुई (वरिष्ठ परामर्शदाता व इंचार्ज, इंटरवेंशनल रेडियोलॉजी, Manipal Hospital मुकुंदपुर) ने पिगटेल कैथेटर डालकर लगभग 800 मिलीलीटर तरल बाहर निकाला, जिससे तुरंत राहत मिली। सुधार की प्रक्रिया चुनौतीपूर्ण रही। मुँह से खिलाने की कोशिशें बार-बार असफल हुईं और पेट में सूजन व दर्द बढ़ गया। तब टीम में शामिल डॉ. भास्वती चक्रवर्ती आचार्य ने शिरा से पोषण देना शुरू किया। लगभग 20 दिन बाद बच्चा धीरे-धीरे मुँह से खाना खाने लगा। एक महीने से अधिक गहन चिकित्सा के बाद उसे स्थिर स्थिति में छुट्टी दे दी गई।



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