भारत के राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) की ओर से किए गए सर्वेक्षण से एक चिंताजनक प्रवृत्ति सामने आई है। भारतीय अब काम में अधिक समय बिता रहे हैं, जबकि आत्म-देखभाल के लिए कम समय निकाल रहे हैं। औसतन लोग अब रोजाना 7 घंटे से अधिक रोजगार से संबंधित कार्यों में लगा रहे हैं, जिससे नींद, स्वच्छता और व्यक्तिगत कार्य क्षमता जैसी गतिविधियों के लिए समय कम दे पा रहे है। यह बदलाव तनाव, बर्नआउट और दीर्घकालिक स्वास्थ्य समस्याओं को बढ़ा सकता है। इस सर्वेक्षण में लैंगिक असमानता भी उजागर हुई है। महिलाएं भले ही औपचारिक कार्यबल में तेजी से शामिल हो रही हों, फिर भी उन्हें अवैतनिक घरेलू काम का अधिक बोझ उठाना पड़ता है। महिलाएं औसतन 289 मिनट घरेलू कार्यों में बिताती हैं, जबकि पुरुष केवल 88 मिनट देते हैं। इसी तरह महिलाएं 137 मिनट देखभाल कार्यों में लगाती हैं, जो पुरुषों की तुलना में लगभग दोगुना है। यह असमानता उनके व्यक्तिगत और व्यावसायिक विकास के अवसरों को सीमित कर रही है और तनाव को बढ़ा रही है। भारत में पहले से ही औसत कार्य सप्ताह 47 घंटे का है, जो कई विकसित अर्थव्यवस्थाओं से अधिक है। अध्ययन बताते हैं कि अत्यधिक कार्य घंटे तनाव, थकान और कार्यक्षमता में गिरावट का कारण बनते हैं। रिमोट और हाइब्रिड वर्क मॉडल के चलते व्यक्तिगत और पेशेवर जीवन के बीच की सीमाएं धुंधली हो गई हैं, जिससे आत्म-देखभाल की कमी और अधिक स्पष्ट हो गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि कार्यस्थल संस्कृति में संरचनात्मक बदलाव लाने की आवश्यकता है, जिसमें लचीली कार्य नीतियां, मानसिक स्वास्थ्य समर्थन, और वेलनेस कार्यक्रम शामिल किए जाएं।

