New Delhi,
केंद्र सरकार ने देश में Rare Earth खनिजों की खोज और Mining गतिविधियों को तेज करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। सरकार ने संसद में जानकारी दी कि परमाणु ऊर्जा विभाग की इकाई एटॉमिक मिनरल्स डायरेक्टरेट फॉर एक्सप्लोरेशन एंड रिसर्च देश के विभिन्न तटीय और भीतरी क्षेत्रों में Rare Earth समूह के खनिजों की खोज और संसाधन वृद्धि का कार्य कर रही है।
सरकार के अनुसार Jan 28,2026 तक एएमडी द्वारा Rare Earth खनिज संसाधनों का आकलन किया गया है। इसके तहत बीच सैंड मिनरल्स के 136 भंडार चिन्हित किए गए हैं, जिनमें 13.15 मिलियन टन मोनाजाइट खनिज मौजूद है। यह खनिज थोरियम और Rare Earth तत्वों का प्रमुख स्रोत माना जाता है। ये भंडार तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, महाराष्ट्र, गुजरात, झारखंड और पश्चिम बंगाल के तटीय और भीतरी क्षेत्रों में पाए गए हैं। इन भंडारों में लगभग 7.23 मिलियन टन इन-सीटू Rare Earth ऑक्साइड संसाधन मौजूद हैं। इसके अलावा राजस्थान और गुजरात के कुछ हिस्सों में कठोर चट्टानों में Rare Earth खनिजों के तीन अन्य भंडार भी आंके गए हैं, जिनमें 1.29 मिलियन टन इन-सीटू Rare Earth ऑक्साइड संसाधन उपलब्ध हैं।
केंद्रीय कोयला एवं खान मंत्री जी. किशन रेड्डी ने राज्यसभा में लिखित उत्तर में बताया कि मोनाजाइट, जो Rare Earth युक्त अयस्क है, उसमें यूरेनियम और थोरियम जैसे रेडियोधर्मी तत्व जुड़े होते हैं। इसी कारण इसके Mining, प्रसंस्करण और शोधन की गतिविधियां सरकारी नियंत्रण में रखी गई हैं। सरकार ने बताया कि Rare Earth क्षेत्र में भारत उन तीन से चार देशों में शामिल है जिनके पास प्लांट, प्रौद्योगिकी और कुशल कार्यबल की क्षमता उपलब्ध है। हालांकि भारतीय भंडार गुणवत्ता के मामले में अपेक्षाकृत कम समृद्ध हैं और रेडियोधर्मी तत्वों के साथ जुड़े होने के कारण इनके निष्कर्षण की प्रक्रिया लंबी, जटिल और महंगी हो जाती है।
यह भी बताया गया कि भारत में उपलब्ध संसाधनों में मुख्य रूप से हल्के Rare Earth तत्व पाए जाते हैं। पर्याप्त संसाधन और क्षमता होने के बावजूद व्यावसायिक Mining और प्रसंस्करण सीमित रहा है, जिसका कारण उन्नत तकनीक की कमी और मूल्य श्रृंखला में मध्य तथा अंतिम चरण के उद्योगों का अभाव है। सरकार ने इस क्षेत्र को प्रोत्साहन देने के लिए नवंबर में “Scheme To Promote Manufacturing Of Sintered Rare Earth Permanent Magnets” को मंजूरी दी है। इस योजना के तहत Rs.7,280 करोड़ के वित्तीय प्रावधान के साथ देश में 6,000 मीट्रिक टन प्रतिवर्ष की एकीकृत Rare Earth Permanent Magnet विनिर्माण क्षमता स्थापित की जाएगी।

