अमेरिका के राष्ट्रपति का पद संभालने के 15 दिनों में डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने फैसलों से दुनिया के कई देशोंं के लिए परेशानियांं खड़ी कर दी है। ट्रंप के नए टैरिफ फैसलों ने वैश्विक अर्थव्यवस्था में काफी उथल-पुथल मचा दी है। इसी उथल-पुथल के बीच भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दो दिवसीय अमेरिकी यात्रा 12 फरवरी को होगी, जहां वे 13 फरवरी को अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप से भी मुलाकात करने वाले है। ट्रंप के दूसरी बार वाइट हाउस में जाने के बाद द्धिपक्षीय और दुनिया के अहम मसलों पर व्यापक चर्चा होगी। संभवत: यह मुलाकात भारत के लिए सकारात्मक हो सकेगी और टैरिफ का मामला भारत के पक्ष में जा सकता है। जहां मैक्सिको, कनाडा और चीन से आयातित वस्तुओं पर भारी टैरिफ वृद्धि कर उन्होंने इन देशों के साथ व्यापारिक तनाव बढ़ा दिया है। पर अब प्रश्न यह उठता है कि क्या टैरिफ केवल एक आर्थिक नीति है, या यह अब शीत युद्ध का हिस्सा बन चुका है? उन्होंने अपने दो पड़ोसी कनाड़ा और मैक्सिको के खिलाफ 25-25 फीसदी टैरिफ लगा दिया। हालांकि, मैक्सिकी राष्ट्रपति क्लाउडिया शिनबाम और कनाडा के पीएम टूडो के द्वारा सीमा सुरक्षा बढ़ाने की शर्त मानने के बाद ट्रम्प ने टैरिफ एक माह के लिए टाल दिया। अब ट्रम्प के निशाने पर यूरोपिय यूनियन (ईयू) के 27 देश हैं। अमेरिका की ओर से मैक्सिको, कनाडा और चीन पर टैरिफ बढ़ाने तथा यूरोपीय देशों को भी टैरिफ बढ़ाने की चेतावनी देने के क्या परिणाम होंगे, यह भविष्य बताएगा। पर इससे अमेरिकी उपभोक् ताओं को अधिक कीमत चुकानी पड़ेगी और कई देश अमेरिकी उत्पादों पर टैरिफ बढ़ाकर जवाब देंगे। इससे अमेरिका का निर्यात प्रभावित होगा और आर्थिक वृद्धि की गति धीमी हो सकती है। वैसे अमेरिका का टैरिफ संबंधी निर्णय लागू होने पर उसके कुल आयात का करीब 40 फीसदी भाग को प्रभावित करेगा। वहीं भारत इस मामले में फिलहाल रक्षात्मक रुख अपनाते हुए बढ़ता दिख रहा है। इसकी ठोस वजहें भी हैं। माना जा रहा है कि ट्रंप भारत से ट्रेड सरप्लस कम करने को कह सकते हैं, लेकिन इस मामले में थोड़ी नरमी दिखाकर और अमेरिका से हथियार, तेल, गैस और कृषि उत्पादों की खरीद बढ़ाकर उन्हें शांत किया जा सकता है। यह इसलिए भी संभव दिखता है क्योंकि ट्रंप की प्राथमिकताएं अभी अलग हैं। लैटिन अमेरिका, चीन, यूरोपियन यूनियन और रूस से निपटना उनके अजेंडे में ऊपर है।

