भारत के आयात पर अमेरिका द्वारा हाल ही में लगाया गया 27% पारस्परिक टैरिफ व्यापारिक तनावों में एक तीव्र वृद्धि है, जिसके द्विपक्षीय संबंधों और भारत के निर्यात पर दूरगामी प्रभाव पड़ सकते हैं। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की व्यापार पुनसंरेखन रणनीति के तहत घोषित यह टैरिफ भारत और अमेरिका के बीच मौजूदा टैरिफ असंतुलनों, जैसे कि अमेरिकी ऑटोमोबाइल पर भारत का 70% शुल्क बनाम अमेरिका का 2.5% को संतुलित करने की कोशिश करता है।
यह शुल्क 9 अप्रैल तक 10% से बढक़र 27% हो जाएगा। हालांकि भारतीय दवा निर्यात, जो कि 9 अरब डॉलर का क्षेत्र है, इस बढ़ोतरी से अछूता रहेगा, लेकिन इलेक्ट्रॉनिक्स, वस्त्र, रत्न और आभूषण जैसे प्रमुख क्षेत्रों पर इसका गहरा प्रभाव पड़ेगा। खासकर सूरत का हीरा उद्योग, जो अमेरिकी मांग पर बहुत अधिक निर्भर है, गंभीर रूप से प्रभावित हो सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम भारत की जीडीपी वृद्धि दर को 30-40 आधार अंक तक घटा सकता है, जिससे भारतीय रिजर्व बैंक को ब्याज दरों में और कटौती करनी पड़ सकती है।
भारत को सावधानी और रणनीति दोनों के साथ प्रतिक्रिया देनी होगी। जहां प्रतिशोधात्मक टैरिफ एक तात्कालिक विकल्प की तरह लग सकता है, वहीं यह महत्वपूर्ण आपूर्ति श्रृंखलाओं को नुकसान पहुँचा सकता है। इसके बजाय, नई दिल्ली को राजनयिक प्रयासों को तेज करते हुए ठप पड़ी व्यापार वार्ताओं को पुनर्जीवित करने और टैरिफ संरचना में सामंजस्य दिखाने की दिशा में काम करना चाहिए। एक लचीली अर्थव्यवस्था के लिए सिर्फ रक्षात्मक नहीं, बल्कि सक्रिय नीति और वैश्विक व्यापार में निष्पक्षता और स्थायित्व सुनिश्चित करने वाली भागीदारी भी आवश्यक है।

