वैश्विक चिप उद्योग में भारत धीरे-धीरे अपनी स्थिति को मजबूत करने में जुटा हुआ है, लेकिन अभी तेज गति नहीं पकड़ सका है। वैसे भारत इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन के तहत फैब्रिकेशन और असेंबली संयंत्रों के विकास के जरिए इस स्थिति का सद्-उपयोग कर रहा है। जहां वैश्विक स्तर पर सेमीकंडक्टर क्षेत्र में दस लाख पेशेवरों की कमी है। भारत अपने विशाल और कुशल इंजीनियरिंग आधार खासकर डिजाइन और अनुसंधान के जरिए इस मांग को पूरा कर सकता है। वैश्विक कंपनियां ताइवान और चीन जैसे जोखिम प्रधान क्षेत्रों से हटकर विकल्पों की तलाश कर रही हैं, जिससे भारत एक विश्वसनीय विनिर्माण भागीदार के रूप में उभर सकता है। ऑटोमोबाइल, टेलीकॉम और उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स के कारण भारत का चिप बाजार धीरे-धीरे बढ़ रहा है और इसके 2030 तक 100-110 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। चिप उद्योग में भारत असेंबली, टेस्टिंग, मार्किंग और पैकेजिंग जैसे कम पूंजी गहन क्षेत्रों पर शुरुआत में ध्यान केंद्रित कर वैश्विक सप्लाई चेन में तेजी से जुड़ सकता है। वैसे तो माइक्रोन, गुजरात और टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स, असम जैसी कंपनियों ने भारत में परिचालन शुरू कर दिया है। डिजाइन लिंक्ड इंसेंटिव योजना के तहत भारत फैबलैस कंपनियों और स्थानीय आईपी निर्माण को बढ़ावा दे रहा है। वहीं केंद्रीय बजट में इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन 2.0 और इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स मैन्युफैक्चरिंग स्कीम के माध्यम से सरकार बुनियादी ढांचे को मजबूत कर रही है। आने वाले वर्षों में भारत केवल चिप्स का आयातक नहीं रहेगा। माइक्रोन, टाटा ग्रुप और सीजी पावर जैसी बड़ी इकाईयों ने भारत में वाणिज्यिक उत्पादन की शुरुआत कर दी है। इन पहल के जरिए भारत के 2032 तक शीर्ष 6 सेमीकंडक्टर देशों में शामिल होने की उम्मीद है। भारत रणनीतिक रूप से मोर देन मूर प्रौद्योगिकियों, जैसे पावर इलेक्ट्रॉनिक्स और कंपाउंड सेमीकंडक्टर में भी अग्रणी स्थिति बना सकता है।

