पिछले काफी दिनों से चल रहे अमेरिका-इजराइल की ईरान युद्ध की वजह से भू-राजनीतिक तनाव और संघर्ष के कारण भारत में प्राकृतिक गैस और एलपीजी की आपूर्ति पर गहरा असर पड़ा है। इसके चलते कई उद्योगों में उत्पादन प्रभावित हुआ है और कुछ को काम बंद करने के लिए मजबूर होना पड़ा है। गैस की कमी से होटल और रेस्टोरेंट का कामकाज ठप हो गया है, जिससे लाखों लोगों का रोजगार संकट मंडरा रहा है। वहीं खुर्जा के पॉटरी उद्योग पर गैस की किल्लत का भारी असर पड़ा है, जिससे 30 हजार मजदूरों की रोजी-रोटी पर खतरा मंडरा रहा है। दूध प्रोसेसिंग और मिठाई निर्माण इकाइयों पर भी गैस की कमी का असर पड़ा है, जिससे कीमतों में उछाल आ सकता है। जहां राजस्थान की अर्थव्यवस्था का मुख्य स्तंभ पर्यटन और डेयरी सेक्टर है, जो गैस की किल्लत से प्रभावित हो रहा है। खाद बनाने वाली फैक्ट्रियों को भी गैस की कमी का सामना करना पड़ रहा है, जिससे उत्पादन प्रभावित हो सकता है। गैस आधारित उत्पादन इकाइयों में ईंधन की कमी से हजारों छोटी फैक्ट्रियों के बंद होने का डर बना हुआ है। आने वाले समय में, सरकार ने घरेलू मांग को पूरा करने के लिए औद्योगिक इकाइयों और कॉमर्शियल गैस सिलेंडरों की सप्लाई में कटौती की है। वहीं सरकार ने स्थिति को नियंत्रित करने के लिए कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं, जो भविष्य के लिए कुछ उम्मीद जगाते हैं। जहां एक तरफ केंद्र सरकार ने 2026 का प्राकृतिक गैस आपूर्ति विनियमन आदेश जारी किया है। इसके तहत घरेलू रसोई गैस, सार्वजनिक परिवहन के लिए सीएनजी और उर्वरक उत्पादन जैसे आवश्यक क्षेत्रों को प्राथमिकता दी गई है। उर्वरक संयंत्रों को उनकी औसत खपत का कम से कम 70 फीसदी गैस सुनिश्चित करने के आदेश दिए गए है। वहीं दूसरी तरफ सरकार वैश्विक स्तर पर अन्य मार्गों से गैस आयात करने के विकल्प तलाश रही है ताकि मध्य-पूर्व के संकट से उत्पन्न आपूर्ति में कमी को पूरा किया जा सके। देश में ईंधन का भंडार बनाए रखने के लिए रिफाइनरियों को उत्पादन क्षमता बढ़ाने के निर्देश दिए गए हैं। वैश्विक स्तर पर कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि जैसे-जैसे नई एलएनजी आपूर्ति परियोजनाएं शुरू होंगी, स्थिति में धीरे-धीरे सुधार आ सकता है। जब तक मध्य-पूर्व में तनाव कम नहीं होता, तब तक बाजार में अस्थिरता बनी रहने की संभावना है।

