भारत हमेशा से शांति का पक्षधर रहा है। विभिन्न देशों के बीच जब कभी विवाद बढ़ा है, तो भारत इसका शांतिदूत बनकर उभरा है। वहीं डॉनल्ड ट्रंप के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव जीतने के बाद से ही दुनियाभर में यह चर्चा तेज है कि यूक्रेन युद्ध पर उनका रुख क्या होगा? इस सवाल की अहमियत का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि यूक्रेन के आसपास के देशों में अभी से इसे लेकर हलचल दिखने लगी है। पोलैंड के प्रधानमंत्री जल्द ही इस संबंध में फ्रांसीसी राष्ट्रपति और ब्रिटिश प्रधानमंत्री के साथ ही नैटो प्रमुख से विचार-विमर्श करने वाले हैं। इन संदेहों और आशंकाओं की जड़ में हैं ट्रंप के चुनाव से पहले दिए गए बयान, जिनमें न केवल 24 घंटे के अंदर रूस-यूक्रेन युद्ध रुकवाने का वादा किया गया था बल्कि युद्ध में यूक्रेन को दी जा रही बाइडन सरकार की मदद पर भी सवाल उठाए गए थे। ऐसे में कुछ हलकों में माना जा रहा है कि राष्ट्रपति पद की शपथ लेने के बाद डॉनल्ड ट्रंप यूक्रेन को मिल रही मदद पर रोक न भी लगाएं तो उसे कम करने का फैसला तो कर ही सकते हैं। हालांकि यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की से पिछले दिनों हुई वार्ता के दौरान ट्रंप ने उन्हें भरोसा दिलाया कि वह रूस से जारी जंग में उनकी मदद करेंगे। लेकिन कूटनीतिक हलकों में इस आश्वासन को ज्यादा अहमियत इसलिए नहीं दी जा रही क्योंकि इसका असल में क्या मतलब है, यह स्पष्ट होना बाकी है। खुद जेलेंस्की ने भी ट्रंप से बातचीत के बाद कहा कि हमें सुनिश्चित करना होगा कि नतीजे सकारात्मक हों। ऐसे में स्वाभाविक ही है कि जहां यूक्रेन पर अमेरिका की ओर से किसी नई पहल या नए कदम की संभावना देखी जा रही है, वहीं यूरोपीय हलकों में इस आशंका को एक वास्तविकता के रूप में लेने की भावना मजबूत हो रही है कि उसे अपनी सुरक्षा से जुड़े मसलों को खुद ही देखना होगा। इस मामले में अमेरिकी मदद को तय मानकर नहीं चला जा सकता। बहरहाल, इन तमाम चिंताओं के पीछे अभी ट्रंप के चुनावी बयानों से बनी धारणाएं ही हैं। योजनाओं से जुड़े इन मसलों में दांव पर बहुत कुछ लगा है, इसलिए जल्दबाजी में किसी फैसले या बदलाव की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए। देखना होगा कि प्रत्याशी ट्रंप के बयानों पर राष्ट्रपति ट्रंप का रुख कैसा होता है। साथ ही, अगर उनके प्रयासों से दुनिया में शांति कायम होती है तो भला उससे अच्छी बात क्या होगी?

