भारत में किसान फसलों की पैदावार बढ़ाने के लिए असंतुलित मात्रा में रासायनिक उर्वरकों यूरिया और डीएपी का निरंतर इस्तेमाल कर रहा है। जो पैदावार तो अधिक दे रहा है, पर मिट्टी की उर्वरता को नष्ट, भूजल को प्रदूषित और खाद्य श्रृंखला के जरिए मानव स्वास्थ्य को गंभीर नुकसान पहुंचा रहा है। जो सभी के लिए घातक सिद्ध हो रहा है। लगातार और असंतुलित इस्तेमाल से मिट्टी में कार्बनिक पदार्थों और सूक्ष्म जीवाणुओं की संख्या तेजी से कम हो रही है। नाइट्रेट जैसे रसायनों के रिसाव से पीने का पानी दूषित हो रहा है, जो छोटे बच्चों में ब्लू बेबी सिंड्रोम जैसी घातक बीमारियां पैदा कर रहा है। इसके लिए सरकार को भी सार्थक कदम उठाते हुए कोई नई योजना या फिर किसानों को उनकी मात्रा अनुपात बताने का सुझाव देते रहना चाहिए। वैसे तो केंद्र सरकार पहले से ही रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग को कम करने के लिए कई पहल कर रही है, जिन्हें और अधिक जमीनी स्तर पर लागू करने की जरूरत है। किसानों को अपनी जमीन की जांच के अनुसार ही सही मात्रा में उर्वरक डालने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। इसके अलावा पीएम-प्रणाम जैसी योजनाओं के तहत राज्यों को रासायनिक उर्वरकों का उपयोग कम करने के लिए वित्तीय प्रोत्साहन दिया जाता है, जिसे व्यापक स्तर पर विस्तारित करने की आवश्यकता है। परंपरागत कृषि विकास योजना और राष्ट्रीय प्राकृतिक कृषि मिशन जैसी योजनाओं के माध्यम से जैविक खाद के उपयोग को निरंतर बढ़ावा देते रहना चाहिए। नैनो यूरिया और नैनो डीएपी जैसी तकनीकों को बढ़ावा देना चाहिए, जो कम इस्तेमाल में अधिक प्रभावकारी होते हैं और रसायनों पर निर्भरता घटाते हैं। किसानों को केवल रसायनों पर निर्भर रहने के बजाय रासायनिक और जैविक उर्वरकों को मिलाकर इस्तेमाल करने का प्रशिक्षण देना चाहिए। किसानों के बीच यूरिया के अत्यधिक दुरुपयोग को रोकने के लिए मूल्य निर्धारण और सब्सिडी तंत्र में सुधार भी जरूरी है, ताकि संतुलित पोषण को बढ़ावा मिले। अंधाधुंध रासायनिक उर्वरक इस्तेमाल मिट्टी, पानी, स्वास्थ्य, जलवायु और किसान की आय—सबके लिए घातक ही है। समाधान रासायनिक उर्वरकों पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं, बल्कि जितनी जरूरत-उतनी खाद, सही खाद, सही समय, सही तरीके से हो।

