चारु भाटिया | जयपुर
नेत्र चिकित्सा के क्षेत्र में दो दशकों से अधिक का अनुभव रखने वाले डॉ. सोनाराम कुमावत ने माइक्रोसर्जरी, लेजर तकनीक और आधुनिक जांच पद्धतियों के माध्यम से आंखों के इलाज में आए व्यापक बदलावों को करीब से देखा है। जोधपुर से चिकित्सा शिक्षा की शुरुआत करने और गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज, कोटा से नेत्र चिकित्सा में स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने चेन्नई जैसे शहरों के कॉर्पोरेट अस्पतालों में भी काम किया। वर्ष 2010 में उन्होंने सीकर में नेत्र चिकित्सा अस्पताल की स्थापना की और अब जयपुर में राजस्थान आई हॉस्पिटल के माध्यम से अपनी सेवाओं का विस्तार किया है। इस साक्षात्कार में डॉ. कुमावत ने आंखों की सर्जरी में आए बदलावों, डिजिटल जीवनशैली के दृष्टि पर प्रभाव, मधुमेह से होने वाली रेटिना संबंधी समस्याओं, रोगों की पहचान में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की भूमिका और आंखों की नियमित देखभाल के महत्व पर चर्चा की।
प्रश्न: आप लंबे समय से नेत्र चिकित्सा के क्षेत्र से जुड़े हैं और हाल ही में जयपुर में भी अपनी सेवाओं का विस्तार किया है। अब तक की अपनी यात्रा और इस क्षेत्र में आने की प्रेरणा के बारे में बताइए।
उत्तर: मेरी चिकित्सा यात्रा वर्ष 1993 में शुरू हुई, जब मैंने जोधपुर से मेडिकल साइंस में स्नातक की पढ़ाई प्रारंभ की। प्रारंभिक चिकित्सा शिक्षा पूरी करने के बाद मैंने दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में जूनियर रेजिडेंट के रूप में काम किया। इसके बाद मैंने गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज (जीएमसी), कोटा से नेत्र चिकित्सा में स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी की।
मुझे चेन्नई जैसे शहरों के कॉर्पोरेट अस्पतालों में काम करने का अनुभव भी मिला। वर्ष 2010 में मैंने सीकर में एक नेत्र चिकित्सा अस्पताल की स्थापना की, ताकि क्षेत्र के मरीजों को विशेष उपचार उपलब्ध कराया जा सके। इस वर्ष मैंने जयपुर में भी अपनी सेवाओं का विस्तार करने का निर्णय लिया, जिसके परिणामस्वरूप राजस्थान आई हॉस्पिटल की स्थापना हुई।
डॉक्टर बनना हमेशा से मेरा लक्ष्य रहा है। चिकित्सा के प्रति मेरी शुरुआत से ही गहरी रुचि थी। नेत्र चिकित्सा ने मुझे लोगों की दृष्टि को सुरक्षित रखने और उनकी खोई हुई दृष्टि वापस पाने में सहायता करके उनके जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने का अवसर दिया।
प्रश्न: पिछले दो दशकों में आंखों की सर्जरी और उपचार के क्षेत्र में आपने कौन–से प्रमुख बदलाव देखे हैं?
उत्तर: इस क्षेत्र में बहुत बड़े बदलाव आए हैं। विशेष रूप से माइक्रोसर्जरी और अधिक सटीक शल्य प्रक्रियाओं के विकास ने आंखों के उपचार को काफी बेहतर बनाया है। पहले आंखों की सर्जरी के बाद मरीजों को कई दिनों तक अस्पताल में भर्ती रहना पड़ता था। अब कई प्रक्रियाएं डे–केयर सर्जरी के रूप में की जाती हैं, जिनमें मरीज कुछ ही घंटों में घर लौट सकता है।
उपचार के बाद ठीक होने में लगने वाला समय भी कम हुआ है। सर्जरी के प्रकार और मरीज की स्थिति के अनुसार, कई लोग दो से तीन दिनों में अपनी सामान्य दिनचर्या शुरू कर सकते हैं। इन तकनीकों ने मरीजों की सुविधा, सर्जरी की सटीकता और उपचार के परिणामों में सुधार किया है। अब कम चीर–फाड़ वाली प्रक्रियाओं, शीघ्र रिकवरी और बेहतर दृष्टि परिणामों पर अधिक ध्यान दिया जा रहा है।
प्रश्न: अलग–अलग आयु वर्ग के लोगों में आंखों की कौन–सी समस्याएं सबसे अधिक देखने को मिलती हैं?
उत्तर: उम्र के अनुसार आंखों की समस्याएं अलग–अलग होती हैं। बच्चों में अपवर्तन संबंधी दोष यानी रिफ्रैक्टिव एरर सबसे आम समस्याओं में से एक है। इसमें मायोपिया, हाइपरोपिया और एस्टिग्मेटिज्म जैसी स्थितियां शामिल हैं। समय पर पहचान और सुधार न होने पर ये समस्याएं बच्चों की पढ़ाई और दैनिक गतिविधियों को प्रभावित कर सकती हैं।
युवाओं में लंबे समय तक स्क्रीन देखने और बदलती जीवनशैली के कारण ड्राई आई यानी आंखों में सूखेपन की समस्या तेजी से देखने को मिल रही है। वहीं, मध्यम आयु और बुजुर्गों में मोतियाबिंद तथा ग्लूकोमा प्रमुख चिंताएं हैं। मोतियाबिंद का उपचार अक्सर सर्जरी से संभव है, जबकि ग्लूकोमा में समय पर निदान और नियमित निगरानी जरूरी है, क्योंकि उचित उपचार न मिलने पर इससे दृष्टि को स्थायी नुकसान हो सकता है।
प्रश्न: आज की डिजिटल जीवनशैली आंखों के स्वास्थ्य को किस तरह प्रभावित कर रही है?
उत्तर: मोबाइल फोन, कंप्यूटर और अन्य डिजिटल उपकरणों पर बढ़ती निर्भरता आंखों को कई तरह से प्रभावित कर रही है। लंबे समय तक स्क्रीन देखने से आंखों में सूखापन, जलन और थकान हो सकती है। कई लोगों को सिरदर्द, असहजता और चिड़चिड़ापन भी महसूस होता है।
स्क्रीन पर ध्यान केंद्रित करते समय लोग सामान्य से कम बार पलकें झपकाते हैं, जिससे आंखों में सूखेपन की समस्या बढ़ सकती है। नियमित अंतराल पर ब्रेक लेना, स्क्रीन से उचित दूरी बनाए रखना, उसकी चमक को समायोजित करना और पर्याप्त रोशनी में काम करना लाभकारी है। हालांकि, यदि समस्या लगातार बनी रहे, तो नेत्र विशेषज्ञ से परामर्श लेना चाहिए।
प्रश्न: मोतियाबिंद को आमतौर पर बढ़ती उम्र से जोड़कर देखा जाता है। क्या यह कम उम्र में भी हो सकता है?
उत्तर: मोतियाबिंद मुख्य रूप से बढ़ती उम्र से जुड़ी समस्या है, लेकिन कुछ परिस्थितियों में यह कम उम्र में भी हो सकता है। परिवार में कम उम्र में मोतियाबिंद होने का इतिहास, कुछ बीमारियां, आंखों में चोट और स्टेरॉयड जैसी दवाओं का लंबे समय तक या अनुचित इस्तेमाल इसके जोखिम को बढ़ा सकता है।
कुछ बच्चों में जन्मजात या आनुवंशिक कारणों से भी मोतियाबिंद हो सकता है। इसलिए दृष्टि में असामान्य बदलाव को केवल उम्र या जीवनशैली से जोड़कर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। समय पर जांच से कारण का पता लगाने और उचित उपचार तय करने में मदद मिलती है।
प्रश्न: आंखों की बीमारियों का पता लगाने में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) की क्या भूमिका है?
उत्तर: नेत्र चिकित्सा में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की काफी संभावनाएं हैं। विशेष रूप से रेटिना की तस्वीरों का विश्लेषण करके शुरुआती चरण में बीमारी के संकेत पहचानने में इसका उपयोग किया जा सकता है। एआई आधारित प्रणालियां रेटिना स्कैन का विश्लेषण करके डायबिटिक रेटिनोपैथी जैसी समस्याओं से जुड़े असामान्य संकेतों को पहचानने में मदद कर सकती हैं।
यह तकनीक स्क्रीनिंग कार्यक्रमों में उपयोगी साबित हो सकती है, विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहां विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता सीमित है। इससे उन मरीजों की पहचान करने में सहायता मिल सकती है जिन्हें आगे की जांच और उपचार की आवश्यकता है। हालांकि, एआई को डॉक्टरों की विशेषज्ञता के सहायक उपकरण के रूप में ही देखना चाहिए। अंतिम निदान और उपचार का निर्णय उचित चिकित्सकीय मूल्यांकन के आधार पर होना चाहिए।
प्रश्न: आंखों को स्वस्थ रखने के लिए कौन–से निवारक उपाय अपनाने चाहिए?
उत्तर: नियमित नेत्र जांच आंखों को स्वस्थ रखने के सबसे महत्वपूर्ण उपायों में से एक है। दृष्टि सामान्य होने पर भी जांच कराना जरूरी है, क्योंकि आंखों की कुछ बीमारियों के शुरुआती चरणों में लक्षण दिखाई नहीं देते। साल में एक बार आंखों की जांच कराना सामान्य रूप से उपयोगी है, हालांकि मधुमेह, ग्लूकोमा के जोखिम या अन्य नेत्र समस्याओं वाले लोगों को अधिक बार जांच की जरूरत हो सकती है।
संतुलित आहार भी आंखों के स्वास्थ्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हरी पत्तेदार सब्जियां, फल, विटामिन ए और सी से भरपूर खाद्य पदार्थ तथा ओमेगा-3 फैटी एसिड युक्त आहार लाभकारी हो सकते हैं। घर का पौष्टिक भोजन करना और अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों का सेवन सीमित रखना बेहतर है। इसके साथ ही, बिना डॉक्टर की सलाह के दवाएं लेने से बचना चाहिए, आंखों को चोट से सुरक्षित रखना चाहिए और दृष्टि में लगातार बदलाव होने पर विशेषज्ञ से संपर्क करना चाहिए।
प्रश्न: महानगरों और छोटे शहरों में नेत्र चिकित्सा सुविधाओं की उपलब्धता में कितना अंतर है?
उत्तर: बड़े महानगरों में आमतौर पर आधुनिक चिकित्सा ढांचा, विशेष सर्जिकल सुविधाएं और शोध संस्थान अधिक उपलब्ध होते हैं। इसके कारण जटिल सर्जरी और विशेष उपचारों तक पहुंच अपेक्षाकृत आसान हो सकती है।
छोटे शहरों में भी स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार हुआ है, लेकिन बुनियादी ढांचे, विशेषज्ञों की उपलब्धता और आधुनिक जांच सुविधाओं के मामले में अभी अंतर बना हुआ है। टियर-2 और टियर-3 शहरों में नेत्र चिकित्सा सेवाओं को मजबूत करना जरूरी है, ताकि मरीजों को उपचार के लिए दूर–दराज के शहरों की यात्रा न करनी पड़े। विशेष अस्पतालों का विस्तार, स्क्रीनिंग कार्यक्रमों में सुधार और जनजागरूकता बढ़ाने से इस अंतर को कम किया जा सकता है।
प्रश्न: नेत्र चिकित्सा को करियर के रूप में चुनने वाले युवा डॉक्टरों को आप क्या संदेश देना चाहेंगे?
उत्तर: नेत्र चिकित्सा एक समर्पित और संतोषजनक क्षेत्र है, जिसमें पेशेवर उत्कृष्टता हासिल करने के साथ समाज के लिए महत्वपूर्ण योगदान देने के अनेक अवसर हैं। किसी व्यक्ति की दृष्टि को बचाना या उसे दोबारा देखने में सक्षम बनाना उसके आत्मविश्वास, स्वतंत्रता और जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बना सकता है।
युवा डॉक्टरों को इस क्षेत्र में समर्पण, अनुशासन और निरंतर सीखने की भावना के साथ आगे बढ़ना चाहिए। चिकित्सा तकनीक तेजी से बदल रही है, इसलिए नई प्रक्रियाओं और शोध से अपडेट रहना जरूरी है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि डॉक्टरों को मरीजों के हित और नैतिक चिकित्सा पद्धतियों को हमेशा प्राथमिकता देनी चाहिए। सही दृष्टिकोण और मेहनत के साथ नेत्र चिकित्सा में पेशेवर विकास और समाज सेवा की अपार संभावनाएं हैं।

