वर्तमान में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) केवल एक तकनीकी प्रगति नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन और आर्थिक कायाकल्प का निर्णायक कारक बन चुकी है। वैश्विक अर्थव्यवस्था में एआई का योगदान अभूतपूर्व है, यह नवाचार, उत्पादकता और आर्थिक विकास को निरंतर गति प्रदान कर रहा है। उद्योग, व्यापार, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि और प्रशासन जैसे क्षेत्रों में इसका बढ़ता उपयोग मानव जीवन को अधिक सरल, कुशल और उत्पादक बना रहा है। भारत जैसे विकासशील देशों के लिए एआई एक परिवर्तनकारी अवसर है। अनुमान है कि वर्ष 2035 तक एआई भारतीय अर्थव्यवस्था में 1.7 ट्रिलियन डॉलर का भारी-भरकम योगदान दे सकता है। कृषि क्षेत्र में मौसम व कीटों की सटीक भविष्यवाणी, स्वास्थ्य सेवा में दूरस्थ चिकित्सा और शिक्षा में बहुभाषी सामग्री के माध्यम से एआई समावेशी विकास का मार्ग प्रशस्त कर रहा है। भारत के लिए एआई विशेष रूप से सार्थक सिद्ध हो सकता है। भारतीय भाषाओं में एआई आधारित सेवाएं शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं को ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंचाने में सहायक हो सकती हैं। किसान फसल संबंधी सलाह प्राप्त कर सकते हैं, छोटे उद्यमी बाजार की आवश्यकताओं को समझ सकते हैं और सरकारी सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार हो सकता है। यदि इसका समावेशी उपयोग सुनिश्चित किया जाए, तो एआई आर्थिक विकास के साथ सामाजिक सशक्तीकरण का भी माध्यम बनेगा। हालांकि, इसके सामने चुनौतियां कम नहीं हैं। स्वचालन के कारण अनेक पारंपरिक नौकरियों पर संकट उत्पन्न हो सकता है। डिजिटल सुविधाओं से वंचित वर्ग विकास की दौड़ में पीछे छूट सकते हैं। इसके अलावा डेटा की गोपनीयता, साइबर अपराध, एल्गोरिदम में पक्षपात और तकनीक पर कुछ बड़ी कंपनियों का बढ़ता नियंत्रण गंभीर चिंताएं हैं।इसलिए एआई को ना तो विकास का अचूक समाधान मानना चाहिए और ना ही केवल खतरे के रूप में देखना चाहिए। आवश्यकता इस बात की है कि तकनीक का विकास मानवीय मूल्यों, पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ हो। एआई का वास्तविक लाभ तभी मिलेगा, जब मशीनें मनुष्य की जगह लेने के बजाय उसकी क्षमताओं को बढ़ाएं और आर्थिक समृद्धि का लाभ समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुंचे।

