भारतीय अर्थव्यवस्था में रुपए की चाल केवल मुद्रा बाजार का उतार-चढ़ाव नहीं, बल्कि देश की आर्थिक स्थिरता, आयात-निर्यात और आम आदमी की जेब से जुड़ा महत्वपूर्ण पक्ष है। भारतीय रिजर्व बैंक के कदमों से रुपए को डॉलर के मुकाबले मजबूती मिली है। गत दिनों रुपया एक महीने के उच्च स्तर पर पहुंचा और सप्ताह के दौरान इसमें करीब दो प्रतिशत की बढ़त दर्ज की गई। यह सुधार बाजार में भरोसा लौटने का संकेत है, हालांकि इसे स्थायी मजबूती मान लेना जल्दबाजी होगी। वहीं भारतीय रिजर्व बैंक ने डॉलर के मुकाबले रुपए में पिछले माह तेज गिरावट को रोकने के लिए कई रणनीतिक और समयबद्ध कदम उठाए थे। उसी का नतीजा रहा की पिछले दिनों रुपए में थोड़ी मजबूती मिली है। केंद्रीय बैंक ने विदेशी मुद्रा भंडार का विवेकपूर्ण उपयोग करते हुए हाजिर और वायदा बाजारों में डॉलर की आपूर्ति बढ़ाई तथा सट्टेबाजी पर सख्त निगरानी रखी। इसके अलावा तेल विपणन कंपनियों की भारी डॉलर मांग को सीधे प्रबंधित करने और घरेलू तरलता को संतुलित रखने के प्रयासों ने मुद्रा में त्वरित सुधार दर्ज कराया है। यदि वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें नियंत्रित रहती हैं और विदेशी संस्थागत निवेशकों का प्रवाह स्थिर रहता है, तो रुपया एक सीमित दायरे में रहकर स्थिरता बनाए रखेगा। हालांकि, वैश्विक तनाव, अनिश्चितताएं, अमेरिकी फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीतियां और वैश्विक आर्थिक सुस्ती आगे भी उतार-चढ़ाव पैदा कर सकती हैं। अगर रुपए में मजबूती आती है तो परिवहन लागत घटेगी और खाद्य वस्तुओं सहित दैनिक उपभोग की चीजों में आयातित महंगाई पर लगाम लगेगी। जहां अर्थव्यवस्था के स्तर पर रुपए की मजबूती देश की आंतरिक क्षमता और निवेशकों के भरोसे का आकलन प्रस्तुत करती है। इससे चालू खाता घाटा नियंत्रण में रहता है और भारत की विदेशी ऋण चुकाने की लागत घटती है। वहीं सरकार को भी निर्यात बढ़ाने, घरेलू विनिर्माण मजबूत करने, ऊर्जा के आयात पर निर्भरता घटाने, विदेशी निवेश आकर्षित करने और राजकोषीय अनुशासन बनाए रखने पर ध्यान देना चाहिए। आरबीआई को भी सट्टात्मक गतिविधियों पर नियंत्रण के साथ पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार और बाजार में भरोसा बनाए रखना होगा।

