Friday, September 25, 2026 |
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दबाव से तैयारी की ओर: बोर्ड परीक्षाओं के लिए शांत और व्यवस्थित दृष्टिकोण

by Business Remedies
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चारु भाटिया| जयपुर

गुरुकुल फाउंडेशन स्कूल, जयपुर की प्रधानाचार्या पूजा शर्मा ने बोर्ड परीक्षाओं को लेकर बच्चों में घबराहट के बजाय तैयारी और आत्मविश्वास विकसित करने के विषय पर अपने विचार साझा किए। वे बायोटेक्नोलॉजी में मास्टर डिग्री (गोल्ड मेडल), बी.एड. और SLET के साथ शिक्षा के क्षेत्र में 13 वर्षों का अनुभव रखती हैं। उनका मानना है कि परीक्षा में सफलता अंतिम समय के दबाव से नहीं, बल्कि निरंतरता, वास्तविक और व्यावहारिक योजना, स्वस्थ दिनचर्या तथा भावनात्मक सहयोग से मिलती है।

प्रश्न: विद्यार्थी बोर्ड परीक्षाओं को लेकर इतने चिंतित क्यों रहते हैं?

पूजा शर्मा: बोर्ड परीक्षाओं को विद्यार्थी गंभीरता से लेते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि उनके परिणाम शैक्षणिक भविष्य के लिए महत्वपूर्ण हैं। लेकिन कई बार परीक्षा से अधिक चिंता परीक्षा को लेकर होने लगती है। विद्यार्थी एक साथ अंक, तुलना, अपेक्षाओं और भविष्य के बारे में सोचने लगते हैं। यह आवश्यक नहीं कि चिंता केवल पाठ्यक्रम की अधिकता के कारण हो। कई बार असली समस्या यह होती है कि शुरुआत कहाँ से करें, यह स्पष्ट नहीं होता। जब विद्यार्थियों के पास एक स्पष्ट रणनीति होती है और वे उस दिशा में लगातार आगे बढ़ते हैं, तो डर अपने आप काफी कम हो जाता है।

प्रश्न: विद्यार्थियों को बोर्ड परीक्षाओं की गंभीर तैयारी कब शुरू करनी चाहिए?

पूजा शर्मा: तैयारी शुरू करने की कोई निश्चित तारीख नहीं होनी चाहिए। यह पूरे शैक्षणिक वर्ष के दौरान धीरे–धीरे चलने वाली प्रक्रिया होनी चाहिए। विद्यार्थियों को विषयों को उसी समय समझने का प्रयास करना चाहिए जब उन्हें कक्षा में पढ़ाया जाता है, न कि परीक्षा के समय तक इंतजार करना चाहिए। इससे नियमित पुनरावृत्ति काफी आसान हो जाती है। बोर्ड परीक्षाएँ नजदीक आने पर विद्यार्थियों को उन विषयों की पुनरावृत्ति पर ध्यान देना चाहिए जिन्हें वे पहले से पढ़ चुके हैं, न कि पूरे पाठ्यक्रम को शुरुआत से पढ़ने का प्रयास करना चाहिए। समय से तैयारी करने का अर्थ यह नहीं है कि विद्यार्थी कई अतिरिक्त घंटे पढ़ें। इसका अर्थ है कि पढ़ाई को अनावश्यक रूप से टालना नहीं चाहिए।

प्रश्न: बोर्ड परीक्षा की तैयारी शुरू करते समय विद्यार्थियों को सबसे पहले क्या करना चाहिए?

पूजा शर्मा: विद्यार्थियों को पाठ्यक्रम सामने रखकर अपनी तैयारी का वास्तविक आकलन करना चाहिए। वे पाठ्यक्रम को तीन भागों में बाँट सकते हैं—वे विषय जिन्हें वे अच्छी तरह जानते हैं, वे विषय जिन्हें पुनरावृत्ति की आवश्यकता है और वे विषय जिन्हें वे अभी पूरी तरह समझ नहीं पाए हैं। इससे उन्हें अपनी वास्तविक स्थिति का पता चलता है। मैं अक्सर विद्यार्थियों से कहती हूँ कि वे “इतना सारा पाठ्यक्रम बाकी है” सोचने के बजाय यह सोचें—“मैं आज क्या पूरा कर सकता हूँ?” जब बड़े पाठ्यक्रम को छोटे–छोटे कार्यों में बाँट दिया जाता है, तो वह आसानी से पूरा किया जा सकता है।

प्रश्न: विद्यार्थी ऐसी अध्ययन समय–सारणी कैसे बनाएँ, जिसका वे वास्तव में पालन कर सकें?

पूजा शर्मा: समय–सारणी वास्तविक विद्यार्थी को ध्यान में रखकर बनाई जानी चाहिए, न कि ऐसे काल्पनिक विद्यार्थी के लिए जो बिना थके 12 घंटे पढ़ सकता हो! विद्यार्थियों को अपने स्कूल के समय, ट्यूशन या कोचिंग कक्षाओं, नींद, भोजन और अन्य जिम्मेदारियों को भी ध्यान में रखना चाहिए। इसके बाद वे वास्तविक और व्यावहारिक अध्ययन समय निर्धारित कर सकते हैं। तीन ऐसे लक्ष्य तय करना और उन्हें पूरा करना बेहतर है जिन्हें वास्तव में हासिल किया जा सके, बजाय इसके कि अत्यधिक महत्वाकांक्षी समय–सारणी बनाई जाए और हर दिन निराशा महसूस की जाए। समय–सारणी मार्गदर्शन देने वाली होनी चाहिए, तनाव का एक और कारण नहीं।

प्रश्न: क्या विद्यार्थियों को एक ही विषय कई घंटों तक पढ़ना चाहिए या बार–बार विषय बदलना चाहिए?

पूजा शर्मा: इसका कोई एक निश्चित नियम नहीं है। लेकिन यदि विद्यार्थी बहुत लंबे समय तक एक ही विषय पढ़ते रहें, तो कभी–कभी उनकी एकाग्रता कम हो सकती है। विद्यार्थी विषयों या पढ़ाई के तरीकों के बीच बदलाव कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, गणित के किसी कठिन विषय पर काम करने के बाद वे भाषा विषय के किसी अध्याय की पुनरावृत्ति कर सकते हैं। मुख्य बात यह है कि मस्तिष्क सक्रिय बना रहे। प्रत्येक अध्ययन सत्र का कोई स्पष्ट उद्देश्य होना चाहिए, केवल निश्चित समय तक किताब लेकर बैठना पर्याप्त नहीं है।

प्रश्न: यदि विद्यार्थी किसी विषय या अध्याय से डरते हैं, तो उन्हें क्या करना चाहिए?

पूजा शर्मा: किसी कठिन अध्याय को लगातार टालने से चिंता और बढ़ जाती है। विद्यार्थियों को यह पहचानना चाहिए कि वास्तव में कठिनाई कहाँ है। क्या अवधारणा समझ में नहीं आ रही? क्या जानकारी याद रखने में समस्या है? क्या प्रश्नों के उत्तर देने में कठिनाई हो रही है? या फिर पर्याप्त अभ्यास नहीं हुआ है? जब समस्या का पता चल जाए, तो वे अपने शिक्षक से मार्गदर्शन ले सकते हैं, चरणबद्ध तरीके से अभ्यास कर सकते हैं और धीरे–धीरे आत्मविश्वास विकसित कर सकते हैं। “मुझे यह समझ नहीं आ रहा है” कहना गलत नहीं है। मार्गदर्शन लेना तैयारी का एक जिम्मेदार तरीका है।

प्रश्न: नई चीजें सीखने की तुलना में पुनरावृत्ति कितनी महत्वपूर्ण है?

पूजा शर्मा: पुनरावृत्ति बहुत महत्वपूर्ण है। केवल एक बार किसी चीज को सीख लेने का अर्थ यह नहीं है कि परीक्षा के समय वह स्वतः याद आ जाएगी। विद्यार्थियों को नियमित रूप से पुनरावृत्ति करनी चाहिए और सारी पुनरावृत्ति अंतिम समय के लिए नहीं छोड़नी चाहिए। छोटी–छोटी अवधि में की गई पुनरावृत्ति बहुत प्रभावी हो सकती है और इससे महत्वपूर्ण विषयों को भूलने से पहले दोहराया जा सकता है। परीक्षा नजदीक आने पर केंद्रित पुनरावृत्ति अधिक प्रभावी होती है। उस समय विद्यार्थियों को अपनी तैयारी को मजबूत करने पर ध्यान देना चाहिए, न कि लगातार नई अध्ययन सामग्री खोजने पर।

प्रश्न: बहुत से विद्यार्थी नोट्स बनाने में काफी समय लगाते हैं। क्या यह हमेशा मददगार होता है?

पूजा शर्मा: नोट्स वास्तव में बहुत उपयोगी हो सकते हैं, बशर्ते उनका कोई स्पष्ट उद्देश्य हो। कभी–कभी विद्यार्थी अपनी नोटबुक को सुंदर बनाने में घंटों लगा देते हैं और सामग्री की पुनरावृत्ति के लिए बहुत कम समय बचता है। नोट्स ऐसे होने चाहिए जिनसे विद्यार्थी आवश्यक जानकारी को जल्दी याद कर सकें। छोटे सारांश, सूत्र, परिभाषाएँ, चित्र, मुख्य शब्द और कठिन बिंदु पुनरावृत्ति के लिए उपयोगी होते हैं। केवल यह महसूस करने के लिए कि आप तैयारी कर रहे हैं, पूरी पाठ्यपुस्तक को दोबारा लिखने की आवश्यकता नहीं है।

प्रश्न: विद्यार्थियों को कैसे पता चलेगा कि वे वास्तव में परीक्षा के लिए तैयार हैं?

पूजा शर्मा: सबसे अच्छे तरीकों में से एक है स्वयं का परीक्षण करना और इसके लिए किताब की सहायता न लेना। किताब बंद करके यह याद करने का प्रयास करें कि आपने क्या पढ़ा है। उत्तर लिखें, प्रश्न हल करें, किसी विषय को मौखिक रूप से समझाएँ या परीक्षा जैसी परिस्थितियों में अभ्यास–पत्र हल करें। यदि कोई विद्यार्थी केवल किताब में उत्तर देखने के बाद ही उसे पहचान पाता है, तो उस विषय की अधिक सक्रिय तरीके से पुनरावृत्ति करने की आवश्यकता हो सकती है। वास्तविक तैयारी तब होती है जब विद्यार्थी स्वयं सीखी हुई बातों को याद कर सकें और उनका प्रयोग कर सकें।

प्रश्न: पिछले वर्षों के प्रश्न–पत्र और सैंपल पेपर कितने उपयोगी हैं?

पूजा शर्मा: परीक्षा के अनुभव को समझने के लिए वे बेहद उपयोगी हैं। विद्यार्थियों को निर्धारित समय के भीतर पूरा प्रश्न–पत्र हल करने का प्रयास करना चाहिए। इससे उन्हें पता चलता है कि वे कितनी तेजी से लिखते हैं, किन प्रश्नों पर उनका अधिक समय लग रहा है और किन प्रकार के प्रश्नों पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। लेकिन प्रश्न–पत्र पूरा कर लेना अभ्यास का अंत नहीं होना चाहिए। विद्यार्थियों को बाद में अपनी गलतियों की समीक्षा करनी चाहिए। एक गलती यह बताती है कि वास्तविक परीक्षा से पहले किस क्षेत्र में सुधार की आवश्यकता है।

प्रश्न: क्या तैयारी के अंतिम दिनों में विद्यार्थियों को रोज सैंपल पेपर हल करने चाहिए?

पूजा शर्मा: जरूरी नहीं। अभ्यास को पुनरावृत्ति के साथ जोड़ा जाना चाहिए। यदि विद्यार्थी अभी भी मूल अवधारणाओं को समझने में कठिनाई महसूस कर रहा है, तो लगातार प्रश्न–पत्र हल करना वास्तविक समस्या का समाधान नहीं करेगा। पहले मूल अवधारणाओं को मजबूत करें और उसके बाद उनके प्रयोग का अभ्यास करें। परीक्षा नजदीक आने पर विद्यार्थी अपनी आवश्यकता के अनुसार समयबद्ध प्रश्न–पत्रों का अधिक अभ्यास कर सकते हैं। उद्देश्य बड़ी संख्या में प्रश्न–पत्र पूरे करना नहीं, बल्कि परीक्षा के प्रारूप के प्रति सहजता और उत्तरों में सटीकता बढ़ाना होना चाहिए।

प्रश्न: वास्तविक बोर्ड परीक्षा के दौरान समय का प्रबंधन कैसे करना चाहिए?

पूजा शर्मा: समय प्रबंधन परीक्षा से पहले ही शुरू हो जाता है। विद्यार्थियों को पूरे प्रश्न–पत्र हल करने का अभ्यास करना चाहिए और घड़ी पर ध्यान रखना चाहिए। परीक्षा के दौरान जल्दबाजी में उत्तर लिखने के बजाय उन्हें प्रश्न–पत्र को ध्यान से पढ़ना चाहिए। उन्हें पहले से एक अनुमान होना चाहिए कि अलग–अलग भागों पर कितना समय दिया जा सकता है। यदि कोई प्रश्न बहुत अधिक समय ले रहा है, तो बेहतर है कि उसे छोड़कर बाद में वापस आएँ, बजाय इसके कि एक कठिन प्रश्न में ही पूरा महत्वपूर्ण समय लगा दिया जाए।



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