मिडिल ईस्ट में फिर से बढ़ते तनाव के कारण कई उद्योगों पर संकट खड़ा हो गया है। कई उद्योगों का निर्यात व आयात गड़बड़ा गया है। यदि युद्ध लंबा चलता है या संघर्ष का दायरा बढ़ता है, तो इसका प्रभाव केवल निर्यात ही नहीं बल्कि कच्चे माल, लॉजिस्टिक्स, लागत और मांग सभी पर पड़ सकता है। ऐसे में स्थानीय या निकटवर्ती बाजारों पर फोकस करने की जरूरत है। पश्चिमी देशों के अलावा उन देशों में निर्यात बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए जो युद्ध क्षेत्र से दूर हैं और जिन पर सीधा असर नहीं पड़ा है। गारमेंट उद्योग को वर्तमान स्थिति में कॉस्ट-कटिंग और संचालन क्षमता में सुधार करके जोखिम प्रबंधन पर सबसे अधिक ध्यान देना चाहिए। लाल सागर और आसपास के समुद्री मार्गों में सुरक्षा जोखिम बढऩे से कई शिपिंग कंपनियां वैकल्पिक मार्ग अपना रही हैं। इससे माल की डिलीवरी में 10-20 दिन तक अतिरिक्त समय लग सकता है। वहीं कंटेनर भाड़ा पहले की तुलना में अधिक बना हुआ है। यदि क्षेत्र में आर्थिक गतिविधियां धीमी होती हैं, तो वहां गारमेंट की मांग कम हो सकती है। भारत से विशेषकर यूएई, सऊदी अरब, कतर और कुवैत को होने वाले निर्यात पर दबाव आ सकता है। अगर युद्ध लंबा चलता है तो कच्चे तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं। इससे बिजली, परिवहन, डाईंग, प्रोसेसिंग और लॉजिस्टिक्स की लागत बढ़ेगी। युद्ध के चलते यूरोप जाने वाले शिपमेंट भी देरी से पहुंचेंगे, जिससे खरीदार वैकल्पिक सप्लायर खोज सकते हैं और निर्यात में गिरावट आ सकती है। इसके अलावा लागत में वृद्धि होगी, यानि फ्रेट चार्ज, बीमा, ईंधन पैकेजिंग एवं लॉजिस्टिक्स सब की लागत बढ़ सकती है। कार्यशील पूंजी पर दबाव बढ़ जाएगा, भुगतान आने में अधिक समय लगेगा। इन्वेंट्री लंबे समय तक फंसी रह सकती है। छोटे और मध्यम उद्योगों पर नकदी का दबाव बढ़ेगा। कच्चे माल की कीमतों में उतार-चढ़ाव आएगा यानि सिंथेटिक फाइबर पेट्रोलियम आधारित होने के कारण महंगे हो सकते हैं। कॉटन पर भी अप्रत्यक्ष असर पड़ सकता है यदि वैश्विक सप्लाई चेन बाधित होती है।

