मिडिल ईस्ट में फिर से तनाव की स्थिति उत्पन्न होने से कच्चे तेल की कीमतों में उछल और समुद्री मार्गों में रुकावट से भारत में महंगाई और आयात बिल बढऩे की उम्मीद है। इसके अलावा वहां काम करने वाले लाखों भारतीयों की सुरक्षा प्रभावित होने और विदेशी निवेश के पलायन की भी संभावना है। अगर तनाव लंबे समय तक बना रहता है या बड़े क्षेत्रीय संघर्ष में बदलता है, तो भारत पर इसका असर कई स्तरों पर पड़ सकता है। भारत की अर्थव्यवस्था वैसे तो विविध है, इसलिए एक झटके से गंभीर संकट की संभावना कम है, लेकिन लंबे समय तक तनाव रहने पर चुनौतियां बढ़ सकती हैं। जहां भारत अपनी तेल आवश्यकता का बड़ा हिस्सा आयात करता है। यदि तेल आपूर्ति बाधित होती है या परिवहन जोखिम बढ़ता है, तो अंतरराष्ट्रीय कीमतें बढ़ सकती हैं। इससे पेट्रोल, डीजल, एलपीजी, बिजली उत्पादन और परिवहन महंगे हो सकते हैं। यदि रणनीतिक समुद्री मार्गों में व्यवधान आता है, तो जहाजों का बीमा और माल ढुलाई महंगी हो सकती है। इससे आयात और निर्यात दोनों की लागत बढ़ेगी। इसके अलावा ईंधन महंगा होने से खाद्यान्न, उर्वरक, सीमेंट, स्टील, प्लास्टिक और अन्य वस्तुओं की लागत भी बढ़ सकती है। इसका सीधा असर आम उपभोक्ता पर पड़ेगा। तेल आयात पर अधिक डॉलर खर्च होने से रुपए पर दबाव आ सकता है। खाड़ी देशों में लाखों भारतीय काम करते हैं। यदि वहां आर्थिक गतिविधियां प्रभावित होती हैं, तो रोजगार और भारत भेजी जाने वाली रकम पर असर पड़ सकता है। वैश्विक अनिश्चितता बढऩे पर विदेशी निवेशक जोखिम वाले बाजारों से पैसा निकाल सकते हैं। इससे शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है। ऐसे भारत को महंगाई, धीमी आर्थिक वृद्धि और राजकोषीय दबाव जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। केंद्र सरकार को इसके लिए प्रभाव रणनीति जैसे ऊर्जा सुरक्षा, आपूर्ति स्रोतों का विविधीकरण, महंगाई नियंत्रण, मजबूत विदेशी मुद्रा प्रबंधन और नवीकरणीय ऊर्जा में तेज निवेश, जिससे अल्पकालिक झटकों को संभालते हुए दीर्घकाल में आयातित ऊर्जा पर निर्भरता कम की जा सके।

