अभी तो मानसून ने सिर्फ दस्तक दी है और प्रदेश की राजधानी जयपुर की रफ्तार पर ब्रेक लग गया। बुधवार को हुई सीजन की पहली हल्की बारिश ने ही शहरी ढर्रे और प्रशासनिक दावों की पूरी कलई खोल दी। महज कुछ मिनटों की इस सांकेतिक बारिश में शहर की प्रमुख सडक़ो पर जाम दिखने लगा। चौराहों पर भी जाम के हालात दिखे।
हर साल मानसून से पहले नगर निगम और जयपुर विकास प्राधिकरण प्री-मानसूनी तैयारियों और नाला सफाई के नाम पर करोड़ों रुपए का बजट कागजों में बहा देते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि ड्रेनेज सिस्टम पूरी तरह चोक है। सडक़ों पर पानी भराव और गड्ढों के कारण शहर की प्रमुख सडक़ों से लेकर परकोटे और बाहरी कॉलोनियों तक, हर जगह यातायात पूरी तरह अस्त-व्यस्त नजर आया।
बड़ा सवाल यह है कि जब महज हल्की फुहार से गुलाबी नगरी का यह हाल हो जाता है, तो आने वाले दिनों में जब मूसलाधार बारिश होगी, तब इस शहर का क्या होगा? क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है? यह स्थिति प्रशासनिक लापरवाही की बानगी नहीं, बल्कि दूरदर्शिता की कमी को भी दर्शाती है। यह तो शुरुआत है। शहरी प्रशासन और राज्य सरकार को अब सुस्ती छोडऩी होगी। युद्धस्तर पर सभी छोटे-बड़े नालों की वास्तविक सफाई जांचनी होगी। संवेदनशील और जलभराव वाले डार्क-स्पॉट्स पर तुरंत सक्शन पंप तैनात किए जाएं। सडक़ों के गड्ढों को तत्काल दुरुस्त किया जाए ताकि हादसे न हों। समय रहते अगर कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले दिनों में जनता को जलभराव और भारी जाम की दोहरी मार झेलनी पड़ेगी। आपदा आने के बाद जागने से बेहतर है कि व्यवस्थाओं को अभी दुरुस्त कर लिया जाए।

