Wednesday, July 15, 2026 |
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चावल का उत्पादन बंपर, लेकिन धंधा हो रहा मंदा

by Business Remedies
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चावल मंदा होने से व्यापार करना हो रहा मुश्किल
व्यापारी बोले, सरकार दे चावल उत्पादन व उद्योग पर ध्यान
बूंदी जिले से होता है हर साल 1800 करोड़ रुपए का कारोबार
बूंदी जिले में लगातार धान का रकबा बढ़ रहा

बिजनेस रेमेडीज/जयपुर। वर्तमान में चावल का व्यापार मंदी के दौर में चल रहा है। सरकार अगर व्यापारियों को सपोर्ट करे तो यह व्यापार ऊपर उठ सकता है। यह कहना है चावल उद्योग से जुड़े व्यापारियों का। व्यापारियों ने बताया, सरकार की नीतियों की वजह से व्यापार बहुत मुश्किल हो रहा है। चावल के दाम लगातार नीचे चल रहे हैं। व्यापारियों का कहना है कि लागत लगातार बढ़ रही है, लेकिन चावल के दाम ऊपर नहीं उठने से व्यापार मिला-जुला चल रहा है। गौरतलब है कि राजस्थान में हाडौती संभाग में पर्याप्त पानी है। इस कारण यहां पर धान की खेती बड़े एरिया में होती है। बूंदी जिले में बड़े क्षेत्र में किसान खरीफ सीजन में धान की फसल पैदा करते हैं। क्षेत्र में लगातार धान का रकबा बढ़ता जा रहा है। पिछले 5 साल में 40,000 हेक्टेयर रकबा धान का बढ़ा है। बूंदी को धान का कटोरा भी कहते हैं। क्योंकि यहां पर बड़े क्षेत्रफल में धान का उत्पादन होता है। यहां का मौसम धान की फसल के लिए सहायक है। अच्छी व एक्सपोर्ट क्वालिटी का धान पैदा होने से हर साल 1400 करोड़ का चावल निर्यात होता है।

बूंदी के चावल की महक और स्वाद बेमिसाल
जानकारी के अनुसार, बूंदी जिले की अर्थव्यवस्था धान पर टिकी है। यहां खुशबूदार चावल देश ही नहीं विदेशों में अपनी महक बिखेरता है। बूंदी की जमीन, पानी में वह खासियत है कि धान की महक स्वाद को बढ़ा देती है। यहां उत्पादन व मुनाफा भी दूसरी जगह से ज्यादा अच्छा होता है। देशभर के दूसरे राज्यों के किसान यहां से बीज लेकर गए हैं, लेकिन वहां के पानी में धान की फसल बूंदी जैसी नहीं पैदा हो पाई।
निर्यात का बड़ा हिस्सा बूंदी से
अगर बारिश सही हो जाए तो इससे मुनाफा देने वाली दूसरी फसल नहीं है। पिछले 5 साल में 40000 हेक्टेयर में धान का रकबा बढ़ा जो दूसरी फसलों से काफी ज्यादा है। कृषि विभाग ने धान का रकबा 1 लाख हेक्टेयर के पार रखा है। भारत से निर्यात होने वाले कुल चावल में से अकेला बूंदी ही हर साल 1400 करोड रुपए का चावल निर्यात कर देता है। 400 करोड़ घरेलू कारोबार होता है।
लाखों किसान रोपते हैं धान
बूंदी जिले में करीब सवा लाख से अधिक किसान धान की फसल करते हैं। चावल के खेती के मामले में जिले का नाम देश-विदेश में है। लोगों को इससे रोजगार भी मिलता है। साधन संपन्न होते किसान, नहरी एरिया तालेड़ा, केशवरायपाटन, बूंदी प्रमुख धान उत्पादक इलाके हैं। यहां 90 प्रतिशत चावल इन्हीं इलाकों में पैदा किया जाता है।
1800 करोड रुपए का सालाना टर्न ओवर
बूंदी जिले की अर्थव्यवस्था के लिए यहां उत्पादित होने वाला धान काफी अहम है। यहां की चावल मिलों का ही 1800 करोड रुपए का टर्नओवर है। 1400 करोड़ का एक्सपोर्ट होता है। ४00 करोड़ लोकल टर्नओवर रहता है। चावल की ऐसी महक होती है कि लोग एक बार खाने के बाद बूंदी का चावल ही मांगते हैं।
विदेशों में बूंदी के चावल की डिमांड
बूंदी के चावल की डिमांड खाड़ी देशों व अन्य देशेां में है। क्वालिटी, खुशबू, चमक के चलते बूंदी के चावल की महक सात समंदर पार तक फैली है। चावल खाड़ी देशों में इराक, ईरान, तुर्की, बहरीन, दुबई, यमन, कुवैत, दक्षिण अफ्रीका में जाता है। हॉन्गकॉन्ग, चीन, रूस में भी इसकी डिमांड रहती है।

— चावल इंडस्ट्री बीते पांच साल से नवाचार के साथ ही चल रही है। चावल की नई वैरायटी व नई किस्में बाजार में आई हैं। चावल एक्सपोर्टेवल आइटम है। इसलिए इस पर जीएसटी नहीं लगता, लेकिन घरेलू स्तर पर 25 किलो की पैकिंग पर पांच प्रतिशत जीएसटी लगता है। ट्रंप टैरिफ का भी हमारी चावल इंडस्ट्री पर कोई फर्क नहीं है। राजस्थान सरकार की चावल उद्योग के लिए कोई सजगता नहीं है। कृषि आधारित उद्योगों के लिए जो सजगता है, वहीं चावल उद्योग के लिए भी है। प्रदेश का चावल बड़ी मात्रा में दूसरे देशों को एक्सपोर्ट होता है। इसलिए सरकार को इस पर ध्यान देना चाहिए, साथ ही किसानों के लिए प्रोत्साहन योजना भी लानी चाहिए, जिससे चावल की खेती का रकबा बढ़ सके।
– नीरज कुमार गोयल, अध्यक्ष, श्री चावल उद्योग संघ, बूंदी
— चावल उत्पादन में प्रति वर्ष चावल की नई किस्में आती हैं। किसान प्रयोग करते रहते हैं। यह डवलपमेंट होता रहता है।
राजस्थान का चावल यूएस नहीं जाता है इसलिये ट्रम्प टैरिफ का असर नही होगा । सरकार कि नीतियों से लगता है कि वह लघु उद्योगों को प्रोत्साहित करने में हिचकती है इस कारण लघु उद्योग धीरे धीरे समाप्त हो जाएंगे । सरकार कोई भी कानून लाने से पूर्व जनता व उद्योगों से सुझाव मांगे तो बेहतर समावेशित कानून बनेगा। सरकार की नीतियों से तो ऐसा लगता है कि वह स्मॉल इंडस्ट्री को समाप्त करना चाहती है। दूसरा अभी हाल में ग्राउंड वाटर बिल जो सरकार लाई है, उसमें एग्रो बेस इंडस्ट्री को भी छूट देनी चाहिए। साथ ही सरकार योजना बनाकर कार्य करे तो व्यापारी व आमजन को फायदा होगा।
– राजेश तापडिय़ा, संरक्षक, श्री चावल उद्योग संघ, बूंदी

— चावल पर कोई जीएसटी नहीं है। इसलिए इसका कोई प्रभाव चावल पर नहीं पड़ेगा। वहीं बीते पांच साल में चावल उद्योग व व्यापार में किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं हुई है। वहीं बूंदी का चावल अमरीका जाता नहीं है। इस कारण ट्रंप टैरिफ पर भी हमारी इंडस्ट्री पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा है। राज्य सरकार की पहले ही स्कीम चल रही है। राजस्थान इनवेस्टमेंट प्रमोशन स्कीम। इस स्कीम का व्यापारियों को फायदा मिल रहा है, लेकिन इसके क्रियान्वयन में व्यापारियों को काफी तकलीफों का सामना करना पड़ रहा है। भावों में लगातार उतार—चढ़ाव होता रहता है। वर्तमान में चावल मंदा चल रहा है। मंदी का असर व्यापार पर पड़ता है।
– भानु न्याती, ऑनर, तानसेन राइस, बूंदी



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