अपने हालिया अध्ययन में यूरोपीय आयोग ने चिंता जतायी है कि सोशल मीडिया पर अतिसक्रियता से युवा पीढ़ी तनाव व थकान से जूझ रही है। इस संकट को लेकर भारतीय समाजविज्ञानी, चिकित्सक व मीडिया भी लंबे समय से चेतावनी देता रहा है, लेकिन जब कोई मुहिम व अध्ययन पश्चिमी जगत से आता है तो हम उसे विशेष महत्व देने लगते हैं। अब जब यूरोपीय आयोग जेनरेशन जेड को लेकर अपने निष्कर्ष सामने ला रहा है तो भारत में नये सिरे से उसकी चर्चा होने लगी है। विडंबना यह है कि पिछली सदी के अंतिम वर्षों से लेकर इस सदी के पहले दशक में पैदा हुए बच्चों की यह पहली पीढ़ी है, जिसे कम उम्र में ही सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों से रूबरू होने का मौका मिल गया था। यह पीढ़ी पारंपरिक मानकों को चुनौती देकर अपना नया आकाश तलाशने की जद्दोजहद में जुटी रही है। इस पीढ़ी ने परंपरागत जीवन मूल्यों को तिलांजलि देकर अपनी महत्वाकांक्षाओं को अंजाम दिया। साथ ही नये नजरिये की जीवनशैली का अंगीकार किया। यह पीढ़ी डिजिटल युग के साथ कदमताल करती नजर आई। इंटरनेट के विस्तार के साथ वह सोशल मीडिया के प्लेटफॉर्मों के साथ सहज दिखी। लेकिन काल्पनिक धरातल पर उगा सोशल मीडिया इस पीढ़ी को यथार्थ से बहुत दूर ले गया। फलत: कठोर यथार्थ से जूझते हुए यह पीढ़ी कल्पना व वास्तविकता के द्वंद्व के चलते तनाव व असहजता के भंवर में जा फंसी। इस बात की पुष्टि यूरोपीय आयोग का अध्ययन भी करता है। आयोग कहता है कि लगातार सोशल मीडिया में सक्रियता के चलते युवाओं में चिंता, मानसिक थकान, कुछ खोने का भय व मोबाइल में चिपके रहने की विसंगतियां सामने आई हैं। यहां उल्लेखनीय है कि वर्ष 2024 के विश्व खुशी सूचकांक रिपोर्ट में भी इन खतरों की तरफ इशारा किया गया था। इस रिपोर्ट में कहा गया था कि युवा वर्ग सबसे अधिक दुखी है। चौंकाने वाली बात यह थी कि उनमें तनाव व डिप्रेशन की वजह पढ़ाई या कैरियर की चिंता नहीं थी बल्कि इसकी मूल वजह सोशल मीडिया ही था।

