वर्ष 1967 में शुरू हुई दल बदल की कहानी
राजस्थान में सरकार बनाने के लिए सबसे पहले दलबदल की कहानी वर्ष 1967 में शुरू हुई। वर्ष 1967 में कांग्रेस के सामने बड़ा राजनीतिक संकट था। सरकार बनाने के लिए कांग्रेस को बहुमत जुटाना आसान नही था तब स्वतंत्र पार्टी के दो विधायकों को तोडक़र राज्य में कांग्रेस ने मोहनलाल सुखाडिय़ा के नेतृत्व में सरकार बनाई, और प्रदेश में कांग्रेस की इस कार्यवाही का राज्य में जबरदस्त विरोधी हुआ और राज्य में पहली बार राष्ट्रपति शासन लागू हुआ। इस घटना के विरोध में जयपुर में हुए जबरदस्त आंदोलन में नो लोगों की पुलिस गोली से मृत्यु हो गई। प्रदेश की 184 विधानसभा सीटों के लिए हुए चुनाव में 184 में से 89 पर कांग्रेस की विजय हुई। कांग्रेस के दामोदरलाल व्यास टोंक और मालपुरा सीट से जीते इसलिए कांग्रेस के पार 88 सीटों के बहुमत माना गया।
उस समय गैर कांग्रेसी विधायकों ने संयुक्त मोर्चा बनाकर सरकार बनाने का दावा पेश किया। इनमे स्वतंत्र पार्टी के 49, जनसंघ के 22 सोशलिस्ट पार्टी के 8 ओर भाकपा के एक, राजा मानसिंह सहित 15 निर्दलीय शामिल थे।तत्कालीन राज्यपाल संपूर्णानंद कांग्रेस को सरकार बनाने का मौका देना चाहते थे। वही महारानी गायत्री देवी, महारावल लक्ष्मण सिंह और जनसंघ के भैरोसिंह शेखावत ने मिलकर सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया। इनके साथ राजा मानसिंह भी राज्यपाल से मिलने गई थे। उसी दौरान राजा मानसिंह की राज्यपाल से बहस हो गई, इस पर राज्यपाल ने अपना फैसला टाल दिया और 4 मार्च 1967 को कांग्रेस को सरकार बनाने कस न्यौता दे दिया। इस फैसले के खिलाफ संयुक्तमोर्चा ने राष्ट्रपति से गुहार की मोर्चे ने राज्यपाल के खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया। 5 मार्च 1967 को जयपुर में पुलिस द्वारा लाठीचार्ज किया गया जिसमें महारावल लक्ष्मण सिंह, भैरोसिंह शेखावत, मास्टर आदितेंद्र आदि के चोट आई। 6 मार्च 1967 को संयुक्तमोर्चा ने राष्ट्रपति के सामने विधायकों की परेड कराई।
केन्द्र सरकार ने शान्ति होने तक फैसला नही लेने का मन बना लिया तो अगले दिन केंद्रिय गृहमंत्री यशवंत राव चह्वाण से मुलाकात कर कफ्र्यू हटाने की मांग की। कांग्रेस ने स्वतंत्र पार्टी के राजगढ़ (अलवर) के समर्थ लाल मीना, और अटरु के रामचरन दोनो स्वतंत्र पार्टी विधायक को तोडक़र कांग्रेस में शमिल कर लिया। इस तरह से राज्य में कांग्रेस की सरकार बनी।
उमेन्द्र दाधीच
@बिज़नेस रेमेडीज

