भारत का वायु प्रदूषण संकट औद्योगिक उत्सर्जन से गहनता से संबद्ध है, क्योंकि देश के लगभग 37त्न सबसे प्रदूषित शहर थर्मल पावर प्लांट और विनिर्माण इकाइयों जैसे बड़े उद्योगों से घिरे हैं। इन शहरों में से 20 प्रतिशत में उद्योगों के मुख्य प्रदूषक होने के बावजूद, राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम के धन का केवल 0.6 प्रतिशत ही औद्योगिक उत्सर्जन को नियंत्रित करने के लिये आवंटित किया जाता है, जिससे समस्या का अभिनिर्धारण और संसाधन आवंटन के बीच एक गंभीर विसंगति उजागर होती है।
भारत में बढ़ते वायु प्रदूषण संकट में वाहनों से होने वाला उत्सर्जन सबसे बड़े योगदानकत्र्ताओं में से एक है। जैसे-जैसे शहरों का विस्तार होता है और वाहनों की संख्या बढ़ती है, हानिकारक प्रदूषकों, विशेष रूप से क्करू2.5 एवं नाइट्रोजन ऑक्साइड का उत्सर्जन अधिक व्यापक होता जाता है।
साथ ही मौसम संबंधी स्थितियां वायु प्रदूषकों के फैलाव और उनके सघन स्तर को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करती हैं। विशेषकर शीतकाल में तापीय उत्क्रमण जैसी घटनाएं प्रदूषकों को सतह के निकट रोक लेती हैं, जिससे वायुगुणवत्ता में तेज़ी से गिरावट आती है। यह परिस्थिति प्रदूषण-नियंत्रण नीतियों में मौसमी कारकों को समाहित करने की आवश्यकता को रेखांकित करती है।
हृ्रस््र के उपग्रह-आधारित आंकड़ों से यह भी पता चला है कि स्थानीय तापमान को बढ़ाने में एरोसोल प्रदूषण की महत्त्वपूर्ण भूमिका है, जो एक जटिल चुनौती को उजागर करता है, जहां प्रदूषण को नियंत्रित करने के प्रयास अनजाने में गर्मी के खतरों को बढ़ा सकते हैं, जिससे वायु गुणवत्ता प्रबंधन और भी जटिल हो जाता है।




