नई दिल्ली,
भारत और यूरोपीय देशों के बीच संबंध अब केवल व्यापार तक सीमित नहीं रहे हैं, बल्कि वे रणनीतिक साझेदारी के रूप में तेजी से मजबूत हो रहे हैं। एक नई रिपोर्ट के अनुसार भारत के जर्मनी और यूरोपीय संघ के साथ संबंध अब अर्थव्यवस्था, प्रौद्योगिकी और स्थिर इंडो-पैसिफिक क्षेत्र जैसे साझा हितों पर आधारित व्यापक सहयोग में बदल रहे हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि हाल के वर्षों में भारत और यूरोप के बीच उच्च स्तरीय यात्राओं तथा नए सहयोग ढांचों ने इन संबंधों को और मजबूत किया है। जर्मनी, फ्रांस, इटली और फिनलैंड जैसे प्रमुख यूरोपीय देशों के साथ भारत ने अपने संबंधों को रणनीतिक स्तर तक पहुंचाया है। इसके साथ ही यूरोपीय संघ के शीर्ष नेतृत्व के साथ भी सहयोग के नए आयाम स्थापित हुए हैं। रिपोर्ट के अनुसार इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के बाद यूरोप अब भारत के लिए दूसरा महत्वपूर्ण रणनीतिक क्षेत्र बनता जा रहा है।
पिछले कुछ वर्षों में भारत और यूरोप के बीच संबंधों की प्रकृति में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। पहले ये संबंध मुख्य रूप से व्यापार, सहायता और प्रवासी भारतीयों से जुड़े राजनीतिक पहलुओं तक सीमित थे, लेकिन अब इनका दायरा रणनीतिक क्षेत्रों तक फैल गया है। अब दोनों पक्ष प्रौद्योगिकी आपूर्ति श्रृंखला, रक्षा उत्पादन में संयुक्त भागीदारी, स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में संयुक्त सहयोग जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में मिलकर काम कर रहे हैं। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि पिछले पांच वर्षों में यूरोपीय संघ ने भारत को वैश्विक व्यवस्था को स्थिर रखने वाली महत्वपूर्ण शक्ति के रूप में देखना शुरू किया है। साथ ही भारत को “ग्लोबल साउथ” की एक प्रमुख आवाज के रूप में भी स्वीकार किया जा रहा है। इसी सोच का परिणाम था कि February 2025 में यूरोपीय संघ के आयुक्तों का पूरा प्रतिनिधिमंडल भारत के दौरे पर आया, जो अपने आप में एक अभूतपूर्व घटना मानी गई।
यूरोप के कई प्रमुख देशों ने भारत के साथ अपने संबंधों को द्विपक्षीय स्तर पर भी मजबूत किया है। फ्रांस ने भारत के साथ अपने संबंधों को “विशेष वैश्विक रणनीतिक साझेदारी” का दर्जा दिया है। जर्मनी और भारत के बीच रणनीतिक साझेदारी के 25 वर्ष पूरे हो चुके हैं। इटली ने वर्ष 2025 से 2029 तक के लिए विस्तृत संयुक्त रणनीतिक कार्य योजना जारी की है। वहीं फिनलैंड ने वर्ष 2026 की शुरुआत में उच्च स्तरीय मंत्रिस्तरीय और राष्ट्रपति स्तर की बैठकों के माध्यम से भारत के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी को और गहरा किया है। विशेषज्ञों के अनुसार इस तरह के सहयोग से बहुस्तरीय ढांचा तैयार हो रहा है। एक ओर यूरोपीय संघ के स्तर पर व्यापार, डिजिटल क्षेत्र और संपर्क परियोजनाओं को लेकर समझौते हो रहे हैं, वहीं दूसरी ओर अलग-अलग यूरोपीय देशों के साथ रक्षा, उद्योग और प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में सीधे सहयोग को बढ़ावा दिया जा रहा है। यह सहयोग भारत की आर्थिक प्रगति और सुरक्षा संबंधी उद्देश्यों को भी मजबूती देता है।
रिपोर्ट में जर्मनी और भारत के संबंधों का विशेष उल्लेख किया गया है। लंबे समय से दोनों देशों के बीच संबंध आर्थिक सहयोग पर आधारित रहे हैं, लेकिन अब यह संबंध रणनीतिक औद्योगिक सहयोग और हरित ऊर्जा परिवर्तन की दिशा में भी आगे बढ़ रहे हैं। January 2026 में जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज का भारत दौरा इसी रणनीतिक दृष्टिकोण का संकेत माना गया। विश्लेषकों का मानना है कि भारत के लिए जर्मनी की पूंजी और प्रौद्योगिकी महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। इससे भारत अपनी आपूर्ति श्रृंखला को अधिक सुरक्षित बना सकता है और घरेलू विनिर्माण तथा हरित ऊर्जा के क्षेत्र में तेजी से प्रगति कर सकता है। दूसरी ओर जर्मनी के लिए भारत एक बड़ा बाजार होने के साथ-साथ चीन पर अत्यधिक निर्भरता को कम करने का अवसर भी प्रदान करता है। इस प्रकार भारत और यूरोप के बीच बढ़ती साझेदारी केवल आर्थिक सहयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वैश्विक राजनीति, सुरक्षा और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भी नए संतुलन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

