कुंजेश कुमार पतसारिया
बिजनेस रेमेडीज/ जयपुर। यूएस-इजरायल और ईरान युद्ध से पिछले काफी दिनों से पश्चिमी एशिया में तनाव बना हुआ है। इसका असर भारत की ऊर्जा व्यवस्था पर भी अब नजर आने लगा है। वर्तमान में वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति, विशेष रूप से प्राकृतिक गैस (एलएनजी) और तेल की आपूर्ति श्रृंखला को बाधित कर सकती है। इसका सीधा असर बिजली उत्पादन और अन्य उद्योगों पर असर पड़ सकता है। ईरान और खाड़ी देशों के पास स्थित हॉर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा व्यापार मार्गों में से एक है। संघर्ष के कारण यहां से जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई है, जिससे भारत सहित कई देशों में तरलीकृत प्राकृतिक गैस की आपूर्ति में बहुत कमी आई है। गैस की कमी से उन बिजली उत्पादन यूनिटों पर दबाव बढ़ गया है, जो पूरी तरह या आंशिक रूप से प्राकृतिक गैस पर निर्भर हैं। इससे बिजली उत्पादन लागत बढऩे और कुछ क्षेत्रों में ग्रिड पर अतिरिक्त दबाव पडऩे की आशंका है। वैसे तो सरकार ने इस संकट को देखते हुए गैस आवंटन में प्राथमिकता तय की है, जिसमें घरेलू उपयोग और अन्य आवश्यक सेवाओं को प्राथमिकता दे रही है। बिजली उत्पादन के लिए मुख्य रूप से प्राकृतिक गैस का उपयोग किया जाता है। प्राकृतिक गैस में मुख्य रूप से मीथेन होती है। इसे कंबाइंड साइकिल गैस टर्बाइन पावर प्लांट में जलाया जाता है, जिससे टर्बाइन घूमते हैं और बिजली उत्पन्न होती है। यह कोयला आधारित संयंत्रों की तुलना में कम प्रदूषण फैलाती है।
बेंगलुरु में प्राकृतिक गैस की सप्लाई बंद
सरकारी महारत्न कंपनी गेल यानी गैस अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (जीएआईएल) ने पिछले दिनों ही बेंगलुरु के येलाहांका गैस आधारित पावर प्लांट को प्राकृतिक गैस की सप्लाई पूरी तरह बंद कर दी है। ऊर्जा मंत्रालय के अधिकारियों ने इसकी पुष्टि की है। कर्नाटक पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड (केपीसीएल) की ओर से स्थापित 370 मेगावाट क्षमता वाला येलाहांका पावर प्लांट राज्य का एकमात्र गैस आधारित बिजली उत्पादन संयंत्र है। अधिकारियों ने बताया कि गैस सप्लाई रुकने से इसके बिजली उत्पादन पर काफी असर पड़ सकता है।


