Washington,
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ईरान को लेकर दिए गए सख्त बयान के बाद वैश्विक बाजारों में गिरावट देखी गई, जबकि कच्चे तेल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ट्रंप ने संकेत दिया कि ईरान के साथ संघर्ष आने वाले कई हफ्तों तक जारी रह सकता है, जिससे आपूर्ति बाधित होने और आर्थिक असर लंबा खिंचने की आशंका बढ़ गई है। ट्रंप के संबोधन के बाद अमेरिकी वायदा बाजारों में गिरावट आई। एसएंडपी 500 वायदा करीब 0.8 प्रतिशत नीचे रहा, नैस्डैक वायदा लगभग 1 प्रतिशत गिरा, जबकि डाउ वायदा में करीब 350 अंकों की गिरावट दर्ज की गई। निवेशकों में अनिश्चितता बढ़ने से बाजार पर दबाव बना रहा। एशियाई बाजारों में भी शुरुआती कारोबार के दौरान कमजोरी देखने को मिली। दक्षिण कोरिया का कोस्पी सूचकांक 2 प्रतिशत से अधिक गिरा, जबकि जापान का निक्केई सूचकांक भी नीचे आया। ऊर्जा आपूर्ति को लेकर बढ़ती चिंता के कारण निवेशकों का भरोसा कमजोर पड़ा।
तेल की कीमतों में तेज उछाल
ट्रंप की चेतावनी के बाद कि यदि कोई समझौता नहीं हुआ तो अमेरिका अगले दो से तीन सप्ताह में ईरान पर कड़ा हमला करेगा, तेल बाजार में तेजी आई। वैश्विक मानक ब्रेंट कच्चा तेल 3 प्रतिशत से अधिक बढ़कर एशियाई कारोबार में 105 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच गया। निवेशक इस बयान से पहले तनाव कम होने या कोई स्पष्ट समाधान निकलने की उम्मीद कर रहे थे। हालांकि, ट्रंप ने जहां एक ओर संघर्ष के अंत के करीब होने की बात कही, वहीं दूसरी ओर आगे सैन्य कार्रवाई के संकेत भी दिए, जिससे अनिश्चितता और बढ़ गई। बाजारों की नजर होर्मुज जलडमरूमध्य पर बनी हुई है, जो वैश्विक तेल आपूर्ति का एक अहम मार्ग है और इस संघर्ष के दौरान प्रभावित हुआ है। विश्लेषकों का कहना है कि यदि यहां बाधा जारी रही, तो वैश्विक आपूर्ति पर दबाव बढ़ेगा और कीमतें ऊंची बनी रह सकती हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार, इस युद्ध के कारण वैश्विक तेल आपूर्ति और मांग के बीच लगभग 10 प्रतिशत की कमी आ चुकी है। इससे उभरती अर्थव्यवस्थाओं में आपूर्ति संकट और वितरण व्यवस्था में बाधाएं उत्पन्न होने का खतरा बढ़ गया है।
महंगाई का दबाव बढ़ने की आशंका
ऊर्जा की बढ़ती लागत से महंगाई को लेकर भी चिंता बढ़ गई है। अमेरिका में पेट्रोल की कीमतें 4 डॉलर प्रति गैलन के पार पहुंच चुकी हैं, जिससे आम उपभोक्ताओं और कारोबार दोनों पर दबाव बढ़ रहा है। ट्रंप ने बढ़ती ईंधन कीमतों को अस्थायी बताया और कहा कि संघर्ष समाप्त होने के बाद बाजार स्थिर हो जाएंगे। हालांकि, अर्थशास्त्रियों का मानना है कि इसका प्रभाव लंबे समय तक रह सकता है। कई विशेषज्ञों ने आर्थिक वृद्धि के अनुमान को घटाया है और चेतावनी दी है कि यदि संघर्ष लंबा चला, तो आर्थिक सुस्ती का खतरा बढ़ सकता है।

